एक गीली सी सुबह में
हरी लकड़ी सी सीली-सीली
कहानी ढूँढने चला हूँ मैं॥
यूँ तो आज मौसम नम है,
पर इन पहाड़ों की चुहलबाज़ी
कभी धूप कभी छाया है।
और कल के सूरज में तपती
कहानी ढूँढने चला हूँ मैं॥
आज जब मैं चढ़ रहा हूँ
उतरते लोगों को देख रहा हूँ।
कल जब मैं नीचे आउँगा
तो धूमिल पाँवों के निशानों में
कहानी ढूँढने चला हूँ मैं॥
यूँ तो दुनिया का शिखर
कदमों के नीचे दबा-कुचला पड़ा है,
पर दूर-दूर तक
कोई छाया भी पीछा नहीं करती।
इन्हीं बियाबानों में कोई आबादी भरी
कहानी ढूँढने चला हूँ मैं॥
सामने खूँटी पर टँगी कमीज़ सा,
कभी पर्वतों कभी दरियाओं में
डोलता फिरा हूँ।
आज स्थिरता की खोज में,
एक इस्त्री लगी हुई
कहानी ढूँढने चला हूँ मैं॥
क़ायनात के सारे नज़राने
यूँ तो सामने बिखरे पड़े हैं,
दिमाग शून्य में सुप्त पड़ा है।
एहसासों को जगा दे उस साथी की
कहानी ढूँढने चला हूँ मैं॥
स्कूल में नए बच्चे जैसा,
भीड़ में मैं घबराता हूँ।
मिलना चाहता हूँ उनसे
जिन्होंने कभी मुझे अपना बताया था।
अनजान चेहरों में जानी-पहचानी
कहानी ढूँढने चला हूँ मैं॥