हूँ पथिक मैं||
चल पडा हूँ उस राह पर,
जो राह है मेरे माही की|
दिल के कोने-अंतरे में प्रतिष्ठापित
मेरे नादाँ इलाही की|
राहें तो वो भी लाख हसीं हैं
जो भरमा रही है; देह को तबीयत से सहला रही हैं|
पर जी इस ढीठ मन का क्या करें,
कमबख्त को इन पथरीली राहों की चुभन भी भा रही है|
हाँ पथिक मैं||
था कांपता इस राह से,
इसमे मुझे मेरा अक्स दिखाई देता है|
मन की परतों में जिसे पीताम्बर से ढँक रखा था,
वो शैतान नग्न हो सामने आता है|
पर हाय, उसकी पुकार को कैसे नज़रंदाज़ करूं
जो उस पार खड़ा मेरी जुदाई सह रहा है|
थरथराती, कांपती मेरी टांगों को
महासागर, भवसागर, फांद जाने को कह रहा है|
यूं डूबने का तो डर है|
पर कभी-न-कभी तो डूबना ही है,
स्वेच्छा से डूब लूँ
रस लेना ही तो निमित्त भर है|
वाह! पथिक मैं||
वो कहता है एक दिन आएगा
जब वो मेरा, मैं उसका हो जाऊँगा|
माया का गुरुत्व धरा-का-धरा रह जाएगा,
मैं सारी रस्सियाँ काट कर बादल हो जाऊँगा|
एक बादल बन जाऊँगा,
इन-उन, सब राहों पर लहराऊंगा|
पर अब किसी की गर्द मुझे छू न पाएगी,
मेरा दामन सूरज का नूर हो जाएगा|
वो कहता है मैं भागीदार ना रह जाऊँगा,
वो मानता है मैं मुरक़िब बन जाऊँगा|
राहों की इस भूल-भुलैया में,
सिरा तलाशते जिस्म पर जोर-जोर ठहाके लगाऊंगा|
वाह! पथिक मैं||
शरीर; इसका कोई अर्थ ना रह जाएगा|
मन; वो अर्थ के परे हो जाएगा|
ये राह, इसका सफ़र, सब सार्थक हो जाएगा
बस जो मेरा माही मुझमे खिल जाएगा|
भंवर में पता हो जाएगा,
बवंडर ठिकाना बन जाएगा|
मेरे नादाँ इलाही की सूरत जिसमे नज़ीर हो,
वही मेरा जहां, मेरा आशियाना हो जाएगा|
बस पथिक मैं||
पर तब तक चलना ही एक काम है,
प्रीतम का दिया प्रदीप्त किये बिना कहाँ चैन, किधर आराम है?
उससे लौ लगाए हुए,
कंकड़ों पे बहते जाना अब सुबह-ओ-शाम है|
पथ लम्बा है, संकरा है, गहरा है, शायद अंतहीन है|
इधर बस मैं और मेरी प्रीत है|
सरसराती हवा, पर, गुनगुना रही है,
"जो थक-हार के ना बैठा, हे पथिक,
शब आने तक गंतव्य नज़दीक है|"