बुधवार, 2 दिसंबर 2009

चंदा चकोर

एक बेहतरीन शेर को आज अपना बनाने का दिल कर रहा है
राज़दां कुछ किताबों पर से गर्त साफ़ करने का दिल कर रहा है
चिलमन के पार से झांकती भूरी आंखों के सदके
क़सीदे-पे-क़सीदे गढ़ने का दिल कर रहा है ।

ऊपर के शेर के बहाव में बहते हुए पेश है मेरी एक और कविता जो मेरी प्रियतमा को समर्पित है।

शब है रूमानी सी...
दूधिया रोशनी में नहाये
पेड़ की सबसे ऊँची टहनी पर
पत्तों की ओट से
मैं और मेरा चित्त, चकोर
अपनी विहंगम सुन्दरता में अलमस्त
चंदा को निहार रहे हैं।

आज चंदा की आभा भी देखते बनती है
चकोर उसकी लीलाएं देख हैरान है
स्वच्छंद आकाश में वो यूँ चक्कर लगा रही है
जैसे वह उसका क्रीड़ास्थल हो
अपनी भीगी चाँदनी बरसाती यूँ ऐंठ रही है
जैसे कोई नव-विवाहिता
पूर्ण साज-ओ-श्रृगार की प्रभा से दमकती हो।

हाँ, वो नव-विवाहिता ही तो है,
चकोर सोचता है
कितनी कोमल, कितनी निर्मल
शायद ये हवा ही तो है
जो उसके घूँघट को उड़ा रही है
और उसके सलोने चहरे का सोना
बड़ी कमनीयता से उजागर कर रही है।
और चकोर इस नर्म हवा को अपनी साँसों में भरकर
अपने तन-मन में बसा लेना चाहता है।

हाय, वह बेचारा भी क्या करे,
ये खामोश अनिल ही तो एक माध्यम है
उसकी चंचल शीतलता को
संपूर्ण लावण्या समेत
चकोर के चाक दामन में उड़ेलने का।

चकोर को अपनी क्षुद्रता का
और चंदा की उच्चता का भान है।
यह भी ज्ञान है
की वह चाहे जितना चाह ले
उस तक उड़कर नही पहुँच सकता।
पर क्या यह स्पष्ट कारण
इतना महान है
कि प्रेम की उछाल को रोक दे?

इस धवल आकाश म
अपनी प्रियतमा की छवि अघोरता
वह प्रेममयी तरंगो में
डूबने-उतरने में व्यस्त है।
क्या फर्क पड़े है?
क्या फर्क पड़े है
जो ये आधा अधूरा मिलन पूरा न हो पाये।
वह तो अपनी मानिनी के विस्तार में मस्त है।
जो आत्माएं मिल जाएँ तो तन मिले न मिले
मन में उठे अरमानो के ज्वार स्वतः
ह्रदय-गंगा में समाहित हो जायेंगे।

पर चकोर तू शांत न रह
चिरस्थायी नही है यह पूर्णिमा।
कृष्ण-पक्ष अभी बाकी है
जब तुझे तेरी चंदा की झांकी तो क्या
झलक तक नसीब न होगी
फ़िर किसे ताकेगा,
ह्रदय की आँहों को
किसकी गर्माहट में तपाएगा।

होइहै वाही जो राम रचि राखा
चकोर संतुष्टि से कहता है।
हाथ-पाँव मारा, हर रण, हर छोर हारा
तब जाके यह सीखा है
कोशिशों में समय क्यूँ व्यर्थ करूँ,
ये जीवन ही अल्पायु है
मैं एकाग्रचित्त अपनी वत्सला के दर्शन में मग्न हूँ
हटो, मुझे किंचित विमुख न करो।

कहकर चकोर फ़िर डूब गया
अपनी स्वामिनी के रस में
चलो अब कथा समाप्त करते हैं
इन्हे अकेला छोड़ देते हैं
ये मिलन इनका है, इन्हे ही तय करने दो
की ये किस्से को क्या खूबसूरत मोड़ देते हैं।

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