गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

ishq

वो जो मद्धम-मद्धम बहते हैं तारे,
कहीं तेरा हिजाब तो नहीं...

वो जो तेरे माथे पर रोशन है,
कहीं वही माहताब तो नहीं...

तेरी अंधियारी ज़ुल्फो में जो खो गया है
कहीं वो नूर-ए-आफ़ताब तो नहीं...

कोई कहे इश्क़-ए-हक़ीकी है, कोई इश्क़-ए-मजाज़ी कह के टाल दे
नूर कहता है, बराए ख़ुदा, इश्क़ का कोई हिसाब तो नहीं...
 

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

समलैंगिकता- अभिशाप अथवा अधिकार

निम्नलिखित निबंध मैंने एवं मेरे प्रिय अनुज श्रीमान हर्षित कुमार ने लगभग साल भर पहले एक पत्रिका हेतु लिखा था. भाव हम दोनों के थे, तथ्य उनके द्वारा प्रदत्त तथा उन्हें शब्दों की माला में पिरोने का कार्य मैंने किया था. दुर्भाग्यवश यह लेख छप नहीं पाया था, और वह निराशाजनक था क्योंकि हमें यह काफी क्रांतिकारी लगा था. उसके बाद से हांलाकि इस विषय पर जैसा कि सर्वविदित है की माननीय दिल्ली उच्च न्यायलय का ऐतिहासिक फैसला भी आ चुका है, किन्तु फिर भी मुझे लगता है कि इस लेख की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है. आशा है कि यह लेख कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में आपको सोचने को विवश करेगा. 

हम भारतीय हैं. गौरतलब है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है. यही लोकतंत्र हमें स्वतंत्रता का अधिकार उपहार-स्वरुप देता है. ये हमारे लिए गर्व करने लायक बात है. किन्तु ताज्जुब होता है ये जानकार कि ऐसे देश में, जहाँ व्यक्ति-विशेष के अधिकारों को परम मान कर संपूर्ण संविधान की रचना की गयी थी, वहां सामाजिक रूढ़ियों के वशीभूत यौन साथी चुनने के कुछ लोगो के मौलिक हक़ का क्रूरता के साथ सरे-आम हनन किया जा रहा है.
जी जनाब, मैं बात कर रहा हूँ समलैंगिकों की, जो अपने ही समाज में हिकारत भरी दृष्टि झेलने हेतु अभिशप्त हैं. विडम्बना देखिये की जो कानून हम भारतीयों को समानता का अधिकार सुनिश्चित करता है, वही इस विषय पर अपने नागरिको में फर्क करता दृष्टिगोचर होता है.
मान्यवर, वैसे तो हम अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का बखान पूरी दुनिया में करते नहीं अघाते, परन्तु समलैंगिकता के विषय में हमें अपनी संस्कृति का अल्प ज्ञान क्यूँ है, कुछ पल्ले नहीं पड़ता. हमें शायद ये तक न पता हो की महर्षि वात्स्यायन ने यौन-शिक्षा के महाग्रंथ कामसूत्र का संपूर्ण नवं अध्याय ही समलैंगिक रीतियों को समर्पित कर रखा है. यही नहीं, समलैंगिकता का उल्लेख हिन्दू धर्म के अन्य पावन ग्रंथो जैसे रिग्वेदा, मनुस्मृति आदि में भी मिलता है.
तो चलिए यह तय हुआ कि ये रीति किसी पाश्चात्य संस्कृति द्वारा 'भ्रष्ट' हुए नवीन मस्तिष्क की उपज नहीं है. तो सवाल ये बचता है की ये विरोध क्यूँ? जो चीज़ आम नहीं वो असामान्य हो, ऐसा तो नहीं होता. सारा आधुनिक विज्ञानं इस एक बात को प्रबल रूप से मानता है कि हर नियम का अपवाद होता है.
यौन-अभिविन्यास किसी व्यक्ति कि पसंद-नापसंद पर निर्भर नहीं करता बल्कि यह तो माँ कि कोख से ही निर्धारित हो कर आता है. अब इस दैवीय हस्तक्षेप को व्यक्ति, चाहे लाख हाँथ-पाँव मार ले, बदल नहीं सकता. जो अबोध लोग इसे अप्राकृतिक कहने कि भूल करते हैं, उनका ध्यान मैं इस तथ्य कि ओर आकर्षित कराना चाहूँगा कि समलैंगिकता विश्व कि लगभग १५०० पशु-प्रजातियों में चिरकाल से प्रचलित है. और यह भी कि हम मानव भी इसी पशु-साम्राज्य के सदस्य हैं.
मानव-मानव में भेद का यह आधार कुछ गले नहीं उतरता. आखिर शारीरिक या मानसिक क्षमता में समलिंगी किसी से कम नहीं है. कई समलैंगिक अपने-अपने क्षेत्रो के महारथी साबित हुए हैं. मैं श्रीमान ऑस्कर-वाइल्ड (विश्व-प्रसिध्हा लेखक) और सर इयान मक्केलन (उच्च-कोटि अभिनेता) का नाम उदाहरणार्थ लेना चाहूँगा. अतः जब समलैंगिकता का अस्तित्व हर संस्कृति, हर देश, नर और नारी दोनों में, और हर उम्र में पाया जाता है, तो यह अप्राकृतिक कैसे हुआ?
अमरीकी मनोवैज्ञानिक संघ और विश्व स्वास्थ्य संगठन दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि ये कोई मानसिक विकार नहीं है. दूर क्यों जाना, समलिंगिकता का सर्वश्रेष्ट चित्रण हमारे यहाँ के ही खजुराहो के मंदिरों में मिलता है. वो मंदिर हमारे लिए पूज्य हैं परन्तु समलैंगिकता अभिशाप, वाह रे हमारे दोहरे मापदंड!
समलैंगिक होना किसी अन्य व्यक्ति के अधिकारों या स्वतंत्रता का हनन करना तो नहीं. मात्र किसी के समलैंगिक होने से किसी और को कोई चोट तो नहीं पहुँच रही. यदि आप नीति का तर्क देते है, तो एक बात बताएं मान्यवर, किसी को अपनी इच्छा के विरूद्ध यौन-सम्बन्ध स्थापित करने हेतु विवश करना कहाँ तक नीतिसंगत है?
अंत में कुछ लोग यह तर्क देने लगते हैं कि समलैंगिकता को इसलिए स्वीकृति नहीं प्रदान की जानी चाहिए क्यूंकि यह एक अनुत्पादक क्रिया है, इसका ध्येय प्रजनन नहीं है. तो हुज़ूर, कंडोम आदि गर्भ-निरोधक उपाय भी सामान्य संसर्ग को अनुत्पादक बना देते हैं. परन्तु यह न मात्र समाज तथा कानून द्वारा स्वीकृति प्राप्त है, बल्कि सरकार इन्हें जोर-शोर से बढ़ावा भी दे रही है. सच तो यह है कि सहवास करना मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में से है, न कि मात्र प्रजनन का साधन. यकीं न हो तो मास्लोव के आवश्यकताओं के सिद्धांत के प्रथम सोपान को देख ले.
एक और चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि ८६ प्रतिशत एड्स-पीड़ित भारतीय मर्द MSM (Men having Sex with Men) श्रेणी में आते हैं. इस तथ्य का खुलासा कुछ महीनो पहले ही किसी और ने नहीं अपितु हमारे माननीय स्वास्थ्य मंत्री श्री अम्बुमणि रामदौस ने किया था. अब सोचिये कि ऐसा क्यों?
ऐसा इसलिए क्योंकि कानूनी अनुमति प्राप्त न होने के कारण कोई भी इन समलैंगिको को सम्भोग के दौरान बरते जाने वाले सुरक्षा उपायों के बारे में खुलकर जानकारी नहीं दे पा रहा है. अतः जब तक इसे विधिसंगत घोषित नहीं किया जाता, ये जानलेवा यौन संचारित रोग कईयों को बेरोकटोक लीलते चले जायेंगे.
अंततः यही कहना चाहूँगा कि यद्यपि हमारा कानून समलैंगिकता के विषय में काफी पक्षपाती है, किन्तु इस महान राष्ट्र के नागरिक होने के नाते हमारा यह कर्त्तव्य बनता है कि हम समाज के एक वर्ग कि अनदेखी न करें. दिल्ली में पिछले वर्ष जंतर-मंतर पे निकली गयी समलैंगिको कि परेड एक काबिल-ए-तारीफ़ क़दम है. और यदि ये भी आपको नागवार गुज़रे तो कम-से-कम इंसानियत की खातिर रहम खा कर उनका मज़ाक तो न उड़ाइए.