वो जो मद्धम-मद्धम बहते हैं तारे,
कहीं तेरा हिजाब तो नहीं...
वो जो तेरे माथे पर रोशन है,
कहीं वही माहताब तो नहीं...
तेरी अंधियारी ज़ुल्फो में जो खो गया है
कहीं वो नूर-ए-आफ़ताब तो नहीं...
कोई कहे इश्क़-ए-हक़ीकी है, कोई इश्क़-ए-मजाज़ी कह के टाल दे
नूर कहता है, बराए ख़ुदा, इश्क़ का कोई हिसाब तो नहीं...
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