सोमवार, 13 अप्रैल 2009

मेरी सुबह

उषा में नहाई सुबह
अपने आगोश में,
पावन उर्जा समेटे हुए
जैसे मेरे ही लिए,
साँसों में ग्रीष्मा भरे
कंगूरे पे आ खड़ी हुई।

मुझे टटोल के
मुझे मद के आँगन से
खींच रही है पगली।
आँखें मलता मैं
जिद पे अड़ा हूँ,
चौखट पे खड़ा हूँ।
पर वो भी कुछ कम ढीठ नही;
अपनी सहस्त्र भंगिमाओं से
मुझे लुभा रही है।
अपनी लहक से, चूडियों की खनक से
मुझे बुला रही है।
हाय, वो कौमार्य की देवी
मुझमें काम जागृत कर रही है।

उफ़, उसने सहलाया मेरा माथा,
सरसरी सी दौड़ गई।
माथे पर उन्माद की कुछ बूँदें
अनायास ही उभर गईं।
वह सुनयना, ब्रह्माण्ड सुन्दरी
आज क्रीड़ा हेतु उतावली है,
अरे बावली है
जो मुझमें अपना तेज बो रही है।
मेरे सुषुप्त अंग-अंग को
अपनी सुरा से धो रही है।

लो मैं हार गया हूँ।
चेतना को मला बना
सीने से लगा चुका हूँ।
पर वो सुन्दरी,
वो मोहिनी, तेजस्विनी,
क्यूँ अब दूर जा रही है?
ओह, वो एक इशारा था;
अपनी पलक की झपक से
वो मुहे बुला रही है,
अपने पथ पर चलने को
उकसा रही है।
हाय, वह मेरी संपूर्ण हस्ती की
ठकुरानी बन बैठी है,
और मैं उसके लावण्य के वशीभूत
चला जा रहा हूँ, चला जा रहा हूँ।

संपूर्ण सृष्टि मानो
उस ओजस्विनी की प्रभा में
सराबोर नृत्य कर रही है।
नभचरों का क्रंदन, थलचरों की पदचाप
सब सुर हैं, संगीत हैं।
और इस धुन में,
हरे तो हरे,
जैसे पथरीले भी झूम रहे हैं।
कहीं ये मधुरता, ये सुरम्यता
कोई जाल तो नही?
या किसी कुटिल कलाकार की कोई
चाल तो नही?

ओह, मेरी पटरानी का आभामंडल
फ़ैल रहा है।
चरों और अप्सराएं ही अप्सराएं
मादक नृत्य कर रही हैं।
क्या प्राणी, क्या प्राणहीन
सब मजबूर हैं, मद मेंन चूर हैं।
ओह, ये कोई दिवास्वप्न है,
मैं शायद फिर
तंद्रा के आँगन में लौट आया हूँ।

पर रहने दो,
मोहे झिंझोड़ना मत।
अरे मैं ठहरा सौंदर्य का पुजारी,
जैसे वो कुसुम और मैं भ्रमर।
मेरी साम्राज्ञी ने मार्ग प्रशस्त कर दिया है,
और मैं मधुबन को उड़ने को तैयार हो चुका हूँ।

रविवार, 12 अप्रैल 2009

नज़्म

किसी तहरीर का फायदा ही क्या
जब कचहरी से बाशिंदे ही गायब है?
दिल पे दस्तक की रपट लिखाए हम
हाथ में शिकायतें लिए खड़े हैं।

रब ने जब सनम को बनाया,
दिल तो दिया हुज़ूर को पर
शऊर-ऐ-इस्तेमाल ना सिखाया।
अब धड़क के ये दिल जब ज़रा दखल बढाता है,
वाह तेरी रुखाई कमबख्त, कुँए से प्यासा चार कदम दूर रह जाता है।
पर हम भी साहब हद ढीठ हैं,
जंग लगे बंद दरवाजों के सामने
आस लगाए अपलक अड़े हैं।
पर हाथ में शिकायते लिए खड़े हैं।

धुएँ में उड़ रही है उम्मीदे ऎसी
जैसे पतझड़ में टूटे पत्तों के समंदर।
मजार पे मायूस खड़ा मैं देख रहा,
चारों तरफ़ रंगीनियों का मंज़र।
अब स्याही इन गलियों में
दिन दुनी रात चौगुनी फ़ैल रही है,
ओ मेरे नादान इलाही
मेरी मिल्कियत एक तू ही, तेरी ही कमी है।
तेरे कुचे की मेरी हस्ती में गहरी सिली हुई जड़ें हैं,
और हाथ में शिकायतें लिए खड़े हैं।

बुत-परस्ती गर गुनाह है, तो हुज़ूर इन कन्धों पर सलीब धरो
सरेआम गुनाह कबूल है।
बूंद-बूंद भरे इस पैमाने पर नूर निहाल है,
मय भरा हो, तेजाब
सब कुबूल है।
सुन्न करने वाले चश्मा-ऐ-इश्क
फ़िक्र किसे, उसकी लौ के सहारे खड़े हैं।
पर हाथ में शिकायतें लिए खड़े हैं।

मेरी नई कविता

शून्य मे ताकूँ
तो दुनिया अलग दिखाई देती है।

मेरा शून्य आक्रांत है, तेरा क्लांत है,
कभी अनहद नाद, कभी पूर्ण शांत है।
शून्य सरल है यह, वह विविध है,
उम्मीदों की तकिया, या तीरों से बिध है।

अनेक हैं शून्य में गर्मी की लपटें,
हर लपट मे तलाश लो एक आसरा।
भूत के भूत को पीछे छोड़,
तय करो भविष्य में लंबा फासला।

जो आराम है मेरे शून्य में, तो आँधी भी है,
शान्ति की पिपिहरी बजाते गांधी भी हैं।
शून्य में ग़ौर से देखो, ब्रह्मांड इसी में है,
मेरे शून्य को तेरे शून्य से जोड़ने का सार इसी में है।

शून्य सुन्दर है, मनोरम है।
शून्य दिव्य है, अनुपम है।
पर कोण बदलो तो इसमें ज्वाला है,
डराती, भरमाती नरमुंडों की माला है।

शून्य में ताकूँ
तो दुनिया अलग दिखाई देती है।

ललित जो शून्य,
चमकता कभी मुफलिसी के आलम में।
और कभी टकराता,
कुछ साहिलों से मानवता के समागम में।

अजीब है शून्य,
प्राणेश्वरी की टीस बढ़ाता है।
कभी अंकों में लग जाये,
तो कॉलेज की फीस बढ़ाता है।

अग्रसर हूं अब शून्य के पथ पर।
आज झांकता हूं,
उस चौखट के पार गंगा में
तो शक्ल की गंध आती है।
शून्य मुझे माफ करे ,
आखिर वही अन्तर्यामी है।

शून्य में ताकूँ
तो दुनिया अलग दिखाई देती है।