किसी तहरीर का फायदा ही क्या
जब कचहरी से बाशिंदे ही गायब है?
दिल पे दस्तक की रपट लिखाए हम
हाथ में शिकायतें लिए खड़े हैं।
रब ने जब सनम को बनाया,
दिल तो दिया हुज़ूर को पर
शऊर-ऐ-इस्तेमाल ना सिखाया।
अब धड़क के ये दिल जब ज़रा दखल बढाता है,
वाह तेरी रुखाई कमबख्त, कुँए से प्यासा चार कदम दूर रह जाता है।
पर हम भी साहब हद ढीठ हैं,
जंग लगे बंद दरवाजों के सामने
आस लगाए अपलक अड़े हैं।
पर हाथ में शिकायते लिए खड़े हैं।
धुएँ में उड़ रही है उम्मीदे ऎसी
जैसे पतझड़ में टूटे पत्तों के समंदर।
मजार पे मायूस खड़ा मैं देख रहा,
चारों तरफ़ रंगीनियों का मंज़र।
अब स्याही इन गलियों में
दिन दुनी रात चौगुनी फ़ैल रही है,
ओ मेरे नादान इलाही
मेरी मिल्कियत एक तू ही, तेरी ही कमी है।
तेरे कुचे की मेरी हस्ती में गहरी सिली हुई जड़ें हैं,
और हाथ में शिकायतें लिए खड़े हैं।
बुत-परस्ती गर गुनाह है, तो हुज़ूर इन कन्धों पर सलीब धरो
सरेआम गुनाह कबूल है।
बूंद-बूंद भरे इस पैमाने पर नूर निहाल है,
मय भरा हो, तेजाब
सब कुबूल है।
सुन्न करने वाले चश्मा-ऐ-इश्क
फ़िक्र किसे, उसकी लौ के सहारे खड़े हैं।
पर हाथ में शिकायतें लिए खड़े हैं।
1 टिप्पणी:
प्रिय बन्धु
बहुत अच्छा लगा आपका लेखन
आज कल तो लिखने पढने वालो की कमी हो गयी है ,ऐसे समय में ब्लॉग पर लोगों को लिखता-पढता देख बडा सुकून मिलता है लेकिन एक कष्ट है कि ब्लॉगर भी लिखने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं जबकि पढने पर कम .--------
नई कला, नूतन रचनाएँ ,नई सूझ ,नूतन साधन
नये भाव ,नूतन उमंग से , वीर बने रहते नूतन
शुभकामनाये
जय हिंद
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