रविवार, 12 अप्रैल 2009

मेरी नई कविता

शून्य मे ताकूँ
तो दुनिया अलग दिखाई देती है।

मेरा शून्य आक्रांत है, तेरा क्लांत है,
कभी अनहद नाद, कभी पूर्ण शांत है।
शून्य सरल है यह, वह विविध है,
उम्मीदों की तकिया, या तीरों से बिध है।

अनेक हैं शून्य में गर्मी की लपटें,
हर लपट मे तलाश लो एक आसरा।
भूत के भूत को पीछे छोड़,
तय करो भविष्य में लंबा फासला।

जो आराम है मेरे शून्य में, तो आँधी भी है,
शान्ति की पिपिहरी बजाते गांधी भी हैं।
शून्य में ग़ौर से देखो, ब्रह्मांड इसी में है,
मेरे शून्य को तेरे शून्य से जोड़ने का सार इसी में है।

शून्य सुन्दर है, मनोरम है।
शून्य दिव्य है, अनुपम है।
पर कोण बदलो तो इसमें ज्वाला है,
डराती, भरमाती नरमुंडों की माला है।

शून्य में ताकूँ
तो दुनिया अलग दिखाई देती है।

ललित जो शून्य,
चमकता कभी मुफलिसी के आलम में।
और कभी टकराता,
कुछ साहिलों से मानवता के समागम में।

अजीब है शून्य,
प्राणेश्वरी की टीस बढ़ाता है।
कभी अंकों में लग जाये,
तो कॉलेज की फीस बढ़ाता है।

अग्रसर हूं अब शून्य के पथ पर।
आज झांकता हूं,
उस चौखट के पार गंगा में
तो शक्ल की गंध आती है।
शून्य मुझे माफ करे ,
आखिर वही अन्तर्यामी है।

शून्य में ताकूँ
तो दुनिया अलग दिखाई देती है।

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