यह कविता उभरती कलाकार प्रियंका शर्मा की कला व उनकी बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर उनकी प्रशंसा हेतु लिखी गई है...आशा है की उनको पसंद आयेगी...
जंग खा चुके भावों की
नई परिभाषाएं खोजती हो,
कुछ ललक है तुम्हारी आँखों में
बड़ा नया-नया सा सोचती हो .
तुम कूची की जादूगरनी,
कुछ मायाजाल सा रचती हो.
निर्मोही इन रंगों का,
एक मोहपाश सा कसती हो.
बियाबान है ये सड़क; बेरंग निगाहें पथराई,
निष्प्राण, निरे इन मनों को
तुम कूची से ही कोंचती हो.
कुछ ललक है तुम्हारी आँखों में
बड़ा नया-नया सा सोचती हो.
आकृतियों में आकांक्षा है,
एक चाह है नूर को पाने की.
ज्यामितीय सीमाओं को ये लांघती हैं,
जैसे ग़ज़ल हों बीते ज़माने की.
छटाओं में सुर है; सूरा है,
उपमाओं के इन्द्रधनुष से
परिदृश्य सलोना खेंचती हो.
कुछ ललक है तुम्हारी आँखों में,
बड़ा नया-नया सा सोचती हो.
उल्लास है वीणा की तारों में,
उत्कंठा गेरू में खेलने की.
आकांक्षा अनूठी, उभरे वक्षों को,
नन्ही साँसों की ऊष्मा झेलने की.
अनवरत अनगिनत रेखाओं से,
अफ्लाक बेदाग तुम रचती हो.
तुम्हारी परतों में झांकना धन्यकारी है,
क्यूंकि नया-नया तुम सोचती हो.
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