वो जो मद्धम-मद्धम बहते हैं तारे,
कहीं तेरा हिजाब तो नहीं...
वो जो तेरे माथे पर रोशन है,
कहीं वही माहताब तो नहीं...
तेरी अंधियारी ज़ुल्फो में जो खो गया है
कहीं वो नूर-ए-आफ़ताब तो नहीं...
कोई कहे इश्क़-ए-हक़ीकी है, कोई इश्क़-ए-मजाज़ी कह के टाल दे
नूर कहता है, बराए ख़ुदा, इश्क़ का कोई हिसाब तो नहीं...
हिन्दी साहित्य समिति
यह ब्लॉग उन हिन्दी-प्रेमियों को समर्पित है जो हिन्दी का प्रयोग करने में गौरवान्वित अनुभव करते हैं। आइए हिन्दी के इस अद्भुत आनंदमय संसार में रच-बस जायें। जय श्री राम ॥
गुरुवार, 15 अप्रैल 2010
शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010
समलैंगिकता- अभिशाप अथवा अधिकार
निम्नलिखित निबंध मैंने एवं मेरे प्रिय अनुज श्रीमान हर्षित कुमार ने लगभग साल भर पहले एक पत्रिका हेतु लिखा था. भाव हम दोनों के थे, तथ्य उनके द्वारा प्रदत्त तथा उन्हें शब्दों की माला में पिरोने का कार्य मैंने किया था. दुर्भाग्यवश यह लेख छप नहीं पाया था, और वह निराशाजनक था क्योंकि हमें यह काफी क्रांतिकारी लगा था. उसके बाद से हांलाकि इस विषय पर जैसा कि सर्वविदित है की माननीय दिल्ली उच्च न्यायलय का ऐतिहासिक फैसला भी आ चुका है, किन्तु फिर भी मुझे लगता है कि इस लेख की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है. आशा है कि यह लेख कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में आपको सोचने को विवश करेगा.
हम भारतीय हैं. गौरतलब है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है. यही लोकतंत्र हमें स्वतंत्रता का अधिकार उपहार-स्वरुप देता है. ये हमारे लिए गर्व करने लायक बात है. किन्तु ताज्जुब होता है ये जानकार कि ऐसे देश में, जहाँ व्यक्ति-विशेष के अधिकारों को परम मान कर संपूर्ण संविधान की रचना की गयी थी, वहां सामाजिक रूढ़ियों के वशीभूत यौन साथी चुनने के कुछ लोगो के मौलिक हक़ का क्रूरता के साथ सरे-आम हनन किया जा रहा है.
जी जनाब, मैं बात कर रहा हूँ समलैंगिकों की, जो अपने ही समाज में हिकारत भरी दृष्टि झेलने हेतु अभिशप्त हैं. विडम्बना देखिये की जो कानून हम भारतीयों को समानता का अधिकार सुनिश्चित करता है, वही इस विषय पर अपने नागरिको में फर्क करता दृष्टिगोचर होता है.
मान्यवर, वैसे तो हम अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का बखान पूरी दुनिया में करते नहीं अघाते, परन्तु समलैंगिकता के विषय में हमें अपनी संस्कृति का अल्प ज्ञान क्यूँ है, कुछ पल्ले नहीं पड़ता. हमें शायद ये तक न पता हो की महर्षि वात्स्यायन ने यौन-शिक्षा के महाग्रंथ कामसूत्र का संपूर्ण नवं अध्याय ही समलैंगिक रीतियों को समर्पित कर रखा है. यही नहीं, समलैंगिकता का उल्लेख हिन्दू धर्म के अन्य पावन ग्रंथो जैसे रिग्वेदा, मनुस्मृति आदि में भी मिलता है.
तो चलिए यह तय हुआ कि ये रीति किसी पाश्चात्य संस्कृति द्वारा 'भ्रष्ट' हुए नवीन मस्तिष्क की उपज नहीं है. तो सवाल ये बचता है की ये विरोध क्यूँ? जो चीज़ आम नहीं वो असामान्य हो, ऐसा तो नहीं होता. सारा आधुनिक विज्ञानं इस एक बात को प्रबल रूप से मानता है कि हर नियम का अपवाद होता है.
यौन-अभिविन्यास किसी व्यक्ति कि पसंद-नापसंद पर निर्भर नहीं करता बल्कि यह तो माँ कि कोख से ही निर्धारित हो कर आता है. अब इस दैवीय हस्तक्षेप को व्यक्ति, चाहे लाख हाँथ-पाँव मार ले, बदल नहीं सकता. जो अबोध लोग इसे अप्राकृतिक कहने कि भूल करते हैं, उनका ध्यान मैं इस तथ्य कि ओर आकर्षित कराना चाहूँगा कि समलैंगिकता विश्व कि लगभग १५०० पशु-प्रजातियों में चिरकाल से प्रचलित है. और यह भी कि हम मानव भी इसी पशु-साम्राज्य के सदस्य हैं.
मानव-मानव में भेद का यह आधार कुछ गले नहीं उतरता. आखिर शारीरिक या मानसिक क्षमता में समलिंगी किसी से कम नहीं है. कई समलैंगिक अपने-अपने क्षेत्रो के महारथी साबित हुए हैं. मैं श्रीमान ऑस्कर-वाइल्ड (विश्व-प्रसिध्हा लेखक) और सर इयान मक्केलन (उच्च-कोटि अभिनेता) का नाम उदाहरणार्थ लेना चाहूँगा. अतः जब समलैंगिकता का अस्तित्व हर संस्कृति, हर देश, नर और नारी दोनों में, और हर उम्र में पाया जाता है, तो यह अप्राकृतिक कैसे हुआ?
अमरीकी मनोवैज्ञानिक संघ और विश्व स्वास्थ्य संगठन दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि ये कोई मानसिक विकार नहीं है. दूर क्यों जाना, समलिंगिकता का सर्वश्रेष्ट चित्रण हमारे यहाँ के ही खजुराहो के मंदिरों में मिलता है. वो मंदिर हमारे लिए पूज्य हैं परन्तु समलैंगिकता अभिशाप, वाह रे हमारे दोहरे मापदंड!
समलैंगिक होना किसी अन्य व्यक्ति के अधिकारों या स्वतंत्रता का हनन करना तो नहीं. मात्र किसी के समलैंगिक होने से किसी और को कोई चोट तो नहीं पहुँच रही. यदि आप नीति का तर्क देते है, तो एक बात बताएं मान्यवर, किसी को अपनी इच्छा के विरूद्ध यौन-सम्बन्ध स्थापित करने हेतु विवश करना कहाँ तक नीतिसंगत है?
अंत में कुछ लोग यह तर्क देने लगते हैं कि समलैंगिकता को इसलिए स्वीकृति नहीं प्रदान की जानी चाहिए क्यूंकि यह एक अनुत्पादक क्रिया है, इसका ध्येय प्रजनन नहीं है. तो हुज़ूर, कंडोम आदि गर्भ-निरोधक उपाय भी सामान्य संसर्ग को अनुत्पादक बना देते हैं. परन्तु यह न मात्र समाज तथा कानून द्वारा स्वीकृति प्राप्त है, बल्कि सरकार इन्हें जोर-शोर से बढ़ावा भी दे रही है. सच तो यह है कि सहवास करना मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में से है, न कि मात्र प्रजनन का साधन. यकीं न हो तो मास्लोव के आवश्यकताओं के सिद्धांत के प्रथम सोपान को देख ले.
एक और चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि ८६ प्रतिशत एड्स-पीड़ित भारतीय मर्द MSM (Men having Sex with Men) श्रेणी में आते हैं. इस तथ्य का खुलासा कुछ महीनो पहले ही किसी और ने नहीं अपितु हमारे माननीय स्वास्थ्य मंत्री श्री अम्बुमणि रामदौस ने किया था. अब सोचिये कि ऐसा क्यों?
ऐसा इसलिए क्योंकि कानूनी अनुमति प्राप्त न होने के कारण कोई भी इन समलैंगिको को सम्भोग के दौरान बरते जाने वाले सुरक्षा उपायों के बारे में खुलकर जानकारी नहीं दे पा रहा है. अतः जब तक इसे विधिसंगत घोषित नहीं किया जाता, ये जानलेवा यौन संचारित रोग कईयों को बेरोकटोक लीलते चले जायेंगे.
अंततः यही कहना चाहूँगा कि यद्यपि हमारा कानून समलैंगिकता के विषय में काफी पक्षपाती है, किन्तु इस महान राष्ट्र के नागरिक होने के नाते हमारा यह कर्त्तव्य बनता है कि हम समाज के एक वर्ग कि अनदेखी न करें. दिल्ली में पिछले वर्ष जंतर-मंतर पे निकली गयी समलैंगिको कि परेड एक काबिल-ए-तारीफ़ क़दम है. और यदि ये भी आपको नागवार गुज़रे तो कम-से-कम इंसानियत की खातिर रहम खा कर उनका मज़ाक तो न उड़ाइए.
हम भारतीय हैं. गौरतलब है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है. यही लोकतंत्र हमें स्वतंत्रता का अधिकार उपहार-स्वरुप देता है. ये हमारे लिए गर्व करने लायक बात है. किन्तु ताज्जुब होता है ये जानकार कि ऐसे देश में, जहाँ व्यक्ति-विशेष के अधिकारों को परम मान कर संपूर्ण संविधान की रचना की गयी थी, वहां सामाजिक रूढ़ियों के वशीभूत यौन साथी चुनने के कुछ लोगो के मौलिक हक़ का क्रूरता के साथ सरे-आम हनन किया जा रहा है.
जी जनाब, मैं बात कर रहा हूँ समलैंगिकों की, जो अपने ही समाज में हिकारत भरी दृष्टि झेलने हेतु अभिशप्त हैं. विडम्बना देखिये की जो कानून हम भारतीयों को समानता का अधिकार सुनिश्चित करता है, वही इस विषय पर अपने नागरिको में फर्क करता दृष्टिगोचर होता है.
मान्यवर, वैसे तो हम अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का बखान पूरी दुनिया में करते नहीं अघाते, परन्तु समलैंगिकता के विषय में हमें अपनी संस्कृति का अल्प ज्ञान क्यूँ है, कुछ पल्ले नहीं पड़ता. हमें शायद ये तक न पता हो की महर्षि वात्स्यायन ने यौन-शिक्षा के महाग्रंथ कामसूत्र का संपूर्ण नवं अध्याय ही समलैंगिक रीतियों को समर्पित कर रखा है. यही नहीं, समलैंगिकता का उल्लेख हिन्दू धर्म के अन्य पावन ग्रंथो जैसे रिग्वेदा, मनुस्मृति आदि में भी मिलता है.
तो चलिए यह तय हुआ कि ये रीति किसी पाश्चात्य संस्कृति द्वारा 'भ्रष्ट' हुए नवीन मस्तिष्क की उपज नहीं है. तो सवाल ये बचता है की ये विरोध क्यूँ? जो चीज़ आम नहीं वो असामान्य हो, ऐसा तो नहीं होता. सारा आधुनिक विज्ञानं इस एक बात को प्रबल रूप से मानता है कि हर नियम का अपवाद होता है.
यौन-अभिविन्यास किसी व्यक्ति कि पसंद-नापसंद पर निर्भर नहीं करता बल्कि यह तो माँ कि कोख से ही निर्धारित हो कर आता है. अब इस दैवीय हस्तक्षेप को व्यक्ति, चाहे लाख हाँथ-पाँव मार ले, बदल नहीं सकता. जो अबोध लोग इसे अप्राकृतिक कहने कि भूल करते हैं, उनका ध्यान मैं इस तथ्य कि ओर आकर्षित कराना चाहूँगा कि समलैंगिकता विश्व कि लगभग १५०० पशु-प्रजातियों में चिरकाल से प्रचलित है. और यह भी कि हम मानव भी इसी पशु-साम्राज्य के सदस्य हैं.
मानव-मानव में भेद का यह आधार कुछ गले नहीं उतरता. आखिर शारीरिक या मानसिक क्षमता में समलिंगी किसी से कम नहीं है. कई समलैंगिक अपने-अपने क्षेत्रो के महारथी साबित हुए हैं. मैं श्रीमान ऑस्कर-वाइल्ड (विश्व-प्रसिध्हा लेखक) और सर इयान मक्केलन (उच्च-कोटि अभिनेता) का नाम उदाहरणार्थ लेना चाहूँगा. अतः जब समलैंगिकता का अस्तित्व हर संस्कृति, हर देश, नर और नारी दोनों में, और हर उम्र में पाया जाता है, तो यह अप्राकृतिक कैसे हुआ?
अमरीकी मनोवैज्ञानिक संघ और विश्व स्वास्थ्य संगठन दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि ये कोई मानसिक विकार नहीं है. दूर क्यों जाना, समलिंगिकता का सर्वश्रेष्ट चित्रण हमारे यहाँ के ही खजुराहो के मंदिरों में मिलता है. वो मंदिर हमारे लिए पूज्य हैं परन्तु समलैंगिकता अभिशाप, वाह रे हमारे दोहरे मापदंड!
समलैंगिक होना किसी अन्य व्यक्ति के अधिकारों या स्वतंत्रता का हनन करना तो नहीं. मात्र किसी के समलैंगिक होने से किसी और को कोई चोट तो नहीं पहुँच रही. यदि आप नीति का तर्क देते है, तो एक बात बताएं मान्यवर, किसी को अपनी इच्छा के विरूद्ध यौन-सम्बन्ध स्थापित करने हेतु विवश करना कहाँ तक नीतिसंगत है?
अंत में कुछ लोग यह तर्क देने लगते हैं कि समलैंगिकता को इसलिए स्वीकृति नहीं प्रदान की जानी चाहिए क्यूंकि यह एक अनुत्पादक क्रिया है, इसका ध्येय प्रजनन नहीं है. तो हुज़ूर, कंडोम आदि गर्भ-निरोधक उपाय भी सामान्य संसर्ग को अनुत्पादक बना देते हैं. परन्तु यह न मात्र समाज तथा कानून द्वारा स्वीकृति प्राप्त है, बल्कि सरकार इन्हें जोर-शोर से बढ़ावा भी दे रही है. सच तो यह है कि सहवास करना मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में से है, न कि मात्र प्रजनन का साधन. यकीं न हो तो मास्लोव के आवश्यकताओं के सिद्धांत के प्रथम सोपान को देख ले.
एक और चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि ८६ प्रतिशत एड्स-पीड़ित भारतीय मर्द MSM (Men having Sex with Men) श्रेणी में आते हैं. इस तथ्य का खुलासा कुछ महीनो पहले ही किसी और ने नहीं अपितु हमारे माननीय स्वास्थ्य मंत्री श्री अम्बुमणि रामदौस ने किया था. अब सोचिये कि ऐसा क्यों?
ऐसा इसलिए क्योंकि कानूनी अनुमति प्राप्त न होने के कारण कोई भी इन समलैंगिको को सम्भोग के दौरान बरते जाने वाले सुरक्षा उपायों के बारे में खुलकर जानकारी नहीं दे पा रहा है. अतः जब तक इसे विधिसंगत घोषित नहीं किया जाता, ये जानलेवा यौन संचारित रोग कईयों को बेरोकटोक लीलते चले जायेंगे.
अंततः यही कहना चाहूँगा कि यद्यपि हमारा कानून समलैंगिकता के विषय में काफी पक्षपाती है, किन्तु इस महान राष्ट्र के नागरिक होने के नाते हमारा यह कर्त्तव्य बनता है कि हम समाज के एक वर्ग कि अनदेखी न करें. दिल्ली में पिछले वर्ष जंतर-मंतर पे निकली गयी समलैंगिको कि परेड एक काबिल-ए-तारीफ़ क़दम है. और यदि ये भी आपको नागवार गुज़रे तो कम-से-कम इंसानियत की खातिर रहम खा कर उनका मज़ाक तो न उड़ाइए.
शनिवार, 12 दिसंबर 2009
प्रियंका को समर्पित
यह कविता उभरती कलाकार प्रियंका शर्मा की कला व उनकी बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर उनकी प्रशंसा हेतु लिखी गई है...आशा है की उनको पसंद आयेगी...
जंग खा चुके भावों की
नई परिभाषाएं खोजती हो,
कुछ ललक है तुम्हारी आँखों में
बड़ा नया-नया सा सोचती हो .
तुम कूची की जादूगरनी,
कुछ मायाजाल सा रचती हो.
निर्मोही इन रंगों का,
एक मोहपाश सा कसती हो.
बियाबान है ये सड़क; बेरंग निगाहें पथराई,
निष्प्राण, निरे इन मनों को
तुम कूची से ही कोंचती हो.
कुछ ललक है तुम्हारी आँखों में
बड़ा नया-नया सा सोचती हो.
आकृतियों में आकांक्षा है,
एक चाह है नूर को पाने की.
ज्यामितीय सीमाओं को ये लांघती हैं,
जैसे ग़ज़ल हों बीते ज़माने की.
छटाओं में सुर है; सूरा है,
उपमाओं के इन्द्रधनुष से
परिदृश्य सलोना खेंचती हो.
कुछ ललक है तुम्हारी आँखों में,
बड़ा नया-नया सा सोचती हो.
उल्लास है वीणा की तारों में,
उत्कंठा गेरू में खेलने की.
आकांक्षा अनूठी, उभरे वक्षों को,
नन्ही साँसों की ऊष्मा झेलने की.
अनवरत अनगिनत रेखाओं से,
अफ्लाक बेदाग तुम रचती हो.
तुम्हारी परतों में झांकना धन्यकारी है,
क्यूंकि नया-नया तुम सोचती हो.
जंग खा चुके भावों की
नई परिभाषाएं खोजती हो,
कुछ ललक है तुम्हारी आँखों में
बड़ा नया-नया सा सोचती हो .
तुम कूची की जादूगरनी,
कुछ मायाजाल सा रचती हो.
निर्मोही इन रंगों का,
एक मोहपाश सा कसती हो.
बियाबान है ये सड़क; बेरंग निगाहें पथराई,
निष्प्राण, निरे इन मनों को
तुम कूची से ही कोंचती हो.
कुछ ललक है तुम्हारी आँखों में
बड़ा नया-नया सा सोचती हो.
आकृतियों में आकांक्षा है,
एक चाह है नूर को पाने की.
ज्यामितीय सीमाओं को ये लांघती हैं,
जैसे ग़ज़ल हों बीते ज़माने की.
छटाओं में सुर है; सूरा है,
उपमाओं के इन्द्रधनुष से
परिदृश्य सलोना खेंचती हो.
कुछ ललक है तुम्हारी आँखों में,
बड़ा नया-नया सा सोचती हो.
उल्लास है वीणा की तारों में,
उत्कंठा गेरू में खेलने की.
आकांक्षा अनूठी, उभरे वक्षों को,
नन्ही साँसों की ऊष्मा झेलने की.
अनवरत अनगिनत रेखाओं से,
अफ्लाक बेदाग तुम रचती हो.
तुम्हारी परतों में झांकना धन्यकारी है,
क्यूंकि नया-नया तुम सोचती हो.
बुधवार, 2 दिसंबर 2009
चंदा चकोर
एक बेहतरीन शेर को आज अपना बनाने का दिल कर रहा है
राज़दां कुछ किताबों पर से गर्त साफ़ करने का दिल कर रहा है
चिलमन के पार से झांकती भूरी आंखों के सदके
क़सीदे-पे-क़सीदे गढ़ने का दिल कर रहा है ।
ऊपर के शेर के बहाव में बहते हुए पेश है मेरी एक और कविता जो मेरी प्रियतमा को समर्पित है।
शब है रूमानी सी...
दूधिया रोशनी में नहाये
पेड़ की सबसे ऊँची टहनी पर
पत्तों की ओट से
मैं और मेरा चित्त, चकोर
अपनी विहंगम सुन्दरता में अलमस्त
चंदा को निहार रहे हैं।
आज चंदा की आभा भी देखते बनती है
चकोर उसकी लीलाएं देख हैरान है
स्वच्छंद आकाश में वो यूँ चक्कर लगा रही है
जैसे वह उसका क्रीड़ास्थल हो
अपनी भीगी चाँदनी बरसाती यूँ ऐंठ रही है
जैसे कोई नव-विवाहिता
पूर्ण साज-ओ-श्रृगार की प्रभा से दमकती हो।
हाँ, वो नव-विवाहिता ही तो है,
चकोर सोचता है
कितनी कोमल, कितनी निर्मल
शायद ये हवा ही तो है
जो उसके घूँघट को उड़ा रही है
और उसके सलोने चहरे का सोना
बड़ी कमनीयता से उजागर कर रही है।
और चकोर इस नर्म हवा को अपनी साँसों में भरकर
अपने तन-मन में बसा लेना चाहता है।
हाय, वह बेचारा भी क्या करे,
ये खामोश अनिल ही तो एक माध्यम है
उसकी चंचल शीतलता को
संपूर्ण लावण्या समेत
चकोर के चाक दामन में उड़ेलने का।
चकोर को अपनी क्षुद्रता का
और चंदा की उच्चता का भान है।
यह भी ज्ञान है
की वह चाहे जितना चाह ले
उस तक उड़कर नही पहुँच सकता।
पर क्या यह स्पष्ट कारण
इतना महान है
कि प्रेम की उछाल को रोक दे?
इस धवल आकाश म
अपनी प्रियतमा की छवि अघोरता
वह प्रेममयी तरंगो में
डूबने-उतरने में व्यस्त है।
क्या फर्क पड़े है?
क्या फर्क पड़े है
जो ये आधा अधूरा मिलन पूरा न हो पाये।
वह तो अपनी मानिनी के विस्तार में मस्त है।
जो आत्माएं मिल जाएँ तो तन मिले न मिले
मन में उठे अरमानो के ज्वार स्वतः
ह्रदय-गंगा में समाहित हो जायेंगे।
पर चकोर तू शांत न रह
चिरस्थायी नही है यह पूर्णिमा।
कृष्ण-पक्ष अभी बाकी है
जब तुझे तेरी चंदा की झांकी तो क्या
झलक तक नसीब न होगी
फ़िर किसे ताकेगा,
ह्रदय की आँहों को
किसकी गर्माहट में तपाएगा।
होइहै वाही जो राम रचि राखा
चकोर संतुष्टि से कहता है।
हाथ-पाँव मारा, हर रण, हर छोर हारा
तब जाके यह सीखा है
कोशिशों में समय क्यूँ व्यर्थ करूँ,
ये जीवन ही अल्पायु है
मैं एकाग्रचित्त अपनी वत्सला के दर्शन में मग्न हूँ
हटो, मुझे किंचित विमुख न करो।
कहकर चकोर फ़िर डूब गया
अपनी स्वामिनी के रस में
चलो अब कथा समाप्त करते हैं
इन्हे अकेला छोड़ देते हैं
ये मिलन इनका है, इन्हे ही तय करने दो
की ये किस्से को क्या खूबसूरत मोड़ देते हैं।
राज़दां कुछ किताबों पर से गर्त साफ़ करने का दिल कर रहा है
चिलमन के पार से झांकती भूरी आंखों के सदके
क़सीदे-पे-क़सीदे गढ़ने का दिल कर रहा है ।
ऊपर के शेर के बहाव में बहते हुए पेश है मेरी एक और कविता जो मेरी प्रियतमा को समर्पित है।
शब है रूमानी सी...
दूधिया रोशनी में नहाये
पेड़ की सबसे ऊँची टहनी पर
पत्तों की ओट से
मैं और मेरा चित्त, चकोर
अपनी विहंगम सुन्दरता में अलमस्त
चंदा को निहार रहे हैं।
आज चंदा की आभा भी देखते बनती है
चकोर उसकी लीलाएं देख हैरान है
स्वच्छंद आकाश में वो यूँ चक्कर लगा रही है
जैसे वह उसका क्रीड़ास्थल हो
अपनी भीगी चाँदनी बरसाती यूँ ऐंठ रही है
जैसे कोई नव-विवाहिता
पूर्ण साज-ओ-श्रृगार की प्रभा से दमकती हो।
हाँ, वो नव-विवाहिता ही तो है,
चकोर सोचता है
कितनी कोमल, कितनी निर्मल
शायद ये हवा ही तो है
जो उसके घूँघट को उड़ा रही है
और उसके सलोने चहरे का सोना
बड़ी कमनीयता से उजागर कर रही है।
और चकोर इस नर्म हवा को अपनी साँसों में भरकर
अपने तन-मन में बसा लेना चाहता है।
हाय, वह बेचारा भी क्या करे,
ये खामोश अनिल ही तो एक माध्यम है
उसकी चंचल शीतलता को
संपूर्ण लावण्या समेत
चकोर के चाक दामन में उड़ेलने का।
चकोर को अपनी क्षुद्रता का
और चंदा की उच्चता का भान है।
यह भी ज्ञान है
की वह चाहे जितना चाह ले
उस तक उड़कर नही पहुँच सकता।
पर क्या यह स्पष्ट कारण
इतना महान है
कि प्रेम की उछाल को रोक दे?
इस धवल आकाश म
अपनी प्रियतमा की छवि अघोरता
वह प्रेममयी तरंगो में
डूबने-उतरने में व्यस्त है।
क्या फर्क पड़े है?
क्या फर्क पड़े है
जो ये आधा अधूरा मिलन पूरा न हो पाये।
वह तो अपनी मानिनी के विस्तार में मस्त है।
जो आत्माएं मिल जाएँ तो तन मिले न मिले
मन में उठे अरमानो के ज्वार स्वतः
ह्रदय-गंगा में समाहित हो जायेंगे।
पर चकोर तू शांत न रह
चिरस्थायी नही है यह पूर्णिमा।
कृष्ण-पक्ष अभी बाकी है
जब तुझे तेरी चंदा की झांकी तो क्या
झलक तक नसीब न होगी
फ़िर किसे ताकेगा,
ह्रदय की आँहों को
किसकी गर्माहट में तपाएगा।
होइहै वाही जो राम रचि राखा
चकोर संतुष्टि से कहता है।
हाथ-पाँव मारा, हर रण, हर छोर हारा
तब जाके यह सीखा है
कोशिशों में समय क्यूँ व्यर्थ करूँ,
ये जीवन ही अल्पायु है
मैं एकाग्रचित्त अपनी वत्सला के दर्शन में मग्न हूँ
हटो, मुझे किंचित विमुख न करो।
कहकर चकोर फ़िर डूब गया
अपनी स्वामिनी के रस में
चलो अब कथा समाप्त करते हैं
इन्हे अकेला छोड़ देते हैं
ये मिलन इनका है, इन्हे ही तय करने दो
की ये किस्से को क्या खूबसूरत मोड़ देते हैं।
गुरुवार, 11 जून 2009
पथिक
हूँ पथिक मैं||
चल पडा हूँ उस राह पर,
जो राह है मेरे माही की|
दिल के कोने-अंतरे में प्रतिष्ठापित
मेरे नादाँ इलाही की|
राहें तो वो भी लाख हसीं हैं
जो भरमा रही है; देह को तबीयत से सहला रही हैं|
पर जी इस ढीठ मन का क्या करें,
कमबख्त को इन पथरीली राहों की चुभन भी भा रही है|
हाँ पथिक मैं||
था कांपता इस राह से,
इसमे मुझे मेरा अक्स दिखाई देता है|
मन की परतों में जिसे पीताम्बर से ढँक रखा था,
वो शैतान नग्न हो सामने आता है|
पर हाय, उसकी पुकार को कैसे नज़रंदाज़ करूं
जो उस पार खड़ा मेरी जुदाई सह रहा है|
थरथराती, कांपती मेरी टांगों को
महासागर, भवसागर, फांद जाने को कह रहा है|
यूं डूबने का तो डर है|
पर कभी-न-कभी तो डूबना ही है,
स्वेच्छा से डूब लूँ
रस लेना ही तो निमित्त भर है|
वाह! पथिक मैं||
वो कहता है एक दिन आएगा
जब वो मेरा, मैं उसका हो जाऊँगा|
माया का गुरुत्व धरा-का-धरा रह जाएगा,
मैं सारी रस्सियाँ काट कर बादल हो जाऊँगा|
एक बादल बन जाऊँगा,
इन-उन, सब राहों पर लहराऊंगा|
पर अब किसी की गर्द मुझे छू न पाएगी,
मेरा दामन सूरज का नूर हो जाएगा|
वो कहता है मैं भागीदार ना रह जाऊँगा,
वो मानता है मैं मुरक़िब बन जाऊँगा|
राहों की इस भूल-भुलैया में,
सिरा तलाशते जिस्म पर जोर-जोर ठहाके लगाऊंगा|
वाह! पथिक मैं||
शरीर; इसका कोई अर्थ ना रह जाएगा|
मन; वो अर्थ के परे हो जाएगा|
ये राह, इसका सफ़र, सब सार्थक हो जाएगा
बस जो मेरा माही मुझमे खिल जाएगा|
भंवर में पता हो जाएगा,
बवंडर ठिकाना बन जाएगा|
मेरे नादाँ इलाही की सूरत जिसमे नज़ीर हो,
वही मेरा जहां, मेरा आशियाना हो जाएगा|
बस पथिक मैं||
पर तब तक चलना ही एक काम है,
प्रीतम का दिया प्रदीप्त किये बिना कहाँ चैन, किधर आराम है?
उससे लौ लगाए हुए,
कंकड़ों पे बहते जाना अब सुबह-ओ-शाम है|
पथ लम्बा है, संकरा है, गहरा है, शायद अंतहीन है|
इधर बस मैं और मेरी प्रीत है|
सरसराती हवा, पर, गुनगुना रही है,
"जो थक-हार के ना बैठा, हे पथिक,
शब आने तक गंतव्य नज़दीक है|"
चल पडा हूँ उस राह पर,
जो राह है मेरे माही की|
दिल के कोने-अंतरे में प्रतिष्ठापित
मेरे नादाँ इलाही की|
राहें तो वो भी लाख हसीं हैं
जो भरमा रही है; देह को तबीयत से सहला रही हैं|
पर जी इस ढीठ मन का क्या करें,
कमबख्त को इन पथरीली राहों की चुभन भी भा रही है|
हाँ पथिक मैं||
था कांपता इस राह से,
इसमे मुझे मेरा अक्स दिखाई देता है|
मन की परतों में जिसे पीताम्बर से ढँक रखा था,
वो शैतान नग्न हो सामने आता है|
पर हाय, उसकी पुकार को कैसे नज़रंदाज़ करूं
जो उस पार खड़ा मेरी जुदाई सह रहा है|
थरथराती, कांपती मेरी टांगों को
महासागर, भवसागर, फांद जाने को कह रहा है|
यूं डूबने का तो डर है|
पर कभी-न-कभी तो डूबना ही है,
स्वेच्छा से डूब लूँ
रस लेना ही तो निमित्त भर है|
वाह! पथिक मैं||
वो कहता है एक दिन आएगा
जब वो मेरा, मैं उसका हो जाऊँगा|
माया का गुरुत्व धरा-का-धरा रह जाएगा,
मैं सारी रस्सियाँ काट कर बादल हो जाऊँगा|
एक बादल बन जाऊँगा,
इन-उन, सब राहों पर लहराऊंगा|
पर अब किसी की गर्द मुझे छू न पाएगी,
मेरा दामन सूरज का नूर हो जाएगा|
वो कहता है मैं भागीदार ना रह जाऊँगा,
वो मानता है मैं मुरक़िब बन जाऊँगा|
राहों की इस भूल-भुलैया में,
सिरा तलाशते जिस्म पर जोर-जोर ठहाके लगाऊंगा|
वाह! पथिक मैं||
शरीर; इसका कोई अर्थ ना रह जाएगा|
मन; वो अर्थ के परे हो जाएगा|
ये राह, इसका सफ़र, सब सार्थक हो जाएगा
बस जो मेरा माही मुझमे खिल जाएगा|
भंवर में पता हो जाएगा,
बवंडर ठिकाना बन जाएगा|
मेरे नादाँ इलाही की सूरत जिसमे नज़ीर हो,
वही मेरा जहां, मेरा आशियाना हो जाएगा|
बस पथिक मैं||
पर तब तक चलना ही एक काम है,
प्रीतम का दिया प्रदीप्त किये बिना कहाँ चैन, किधर आराम है?
उससे लौ लगाए हुए,
कंकड़ों पे बहते जाना अब सुबह-ओ-शाम है|
पथ लम्बा है, संकरा है, गहरा है, शायद अंतहीन है|
इधर बस मैं और मेरी प्रीत है|
सरसराती हवा, पर, गुनगुना रही है,
"जो थक-हार के ना बैठा, हे पथिक,
शब आने तक गंतव्य नज़दीक है|"
मंगलवार, 2 जून 2009
सोमवार, 11 मई 2009
मैं निहारना चाहती हूँ
फ़र्ज़ कीजिये कि एक छोटी बच्ची अपना अक्स आईने में निहार रही है और मन ही मन सोच रही है...
होठों पर अधखिली मुस्कान लिए
कच्चे मन में निर्दोष अरमान लिए
इस शुष्क क्यारी में--
पंखुड़ियों के सूख जाने से पहले
इस शीशे कि चौंध में--
मेरे बिम्ब के पक जाने से पहले
इन बोलती आंखों की अंजुली में शरारत भरकर
गुड़िया के मकान की दीवारों को जमकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।
अभी छुपी हुई हूँ--
लड़कपन की इस मिट्टी को भले चिकनी कह लो
सोंधी महक तो इसी से आती है।
इन छरहरे पांवों में पहली पैंजनिया जब बांधूंगी,
इन छोटे कृष्ण-कान्त बालों में पहली चोटी जब बांधूंगी,
गंगा की लहरों सा मन लेगा हिलोरें
खिलखिलाहट बुझे और अबोध को बाखूब भाती हैं।
उस तट पर जो जल रहा है, क्या मालूम?
मुझे दृष्टिगोचर है उस तपिश में नई धूम।
इस तट से उस तट को जाती नौका पर चढ़कर
बाकी सवारियों से रोकर, मनुहार कर, लड़कर
मैं निहारना चाहती हूँ।।
अभी रुकी हुई हूँ--
कल के स्वच्छंद गगन में विचरण करते पंछियों
मुझे मेरी बेड़ी की छुअन भी तकिये सी लगती है।
काट दूंगी इन बेडियों को, हाँ, काट दूंगी
मुझ पर किसी का कोई हक नहीं।
करूंगी कोशिश, सलामत रहे विचारों की कोमलता
शरीर हांलाकि सख्त हो जाएगा, कोई शक नहीं।
शिखर पर धडधडाती पहुँचती रेल में यूँ जा बैठुंगी,
मुंह-बाए देखते कीडे-मकौडों की आग सेकूंगी और ऐंठूंगी।
इस चकरघिन्नी पर गोल-गोल घूमकर
सागरमाथे को सहलाकर, चूमकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।
अभी खामोश खड़ी हूँ--
मेरी प्रेम कलोल को फिलहाल चीत्कार कह लो,
इन निष्प्राण छत्तों का शहद तो यही है।
भीमकाय नियमों के आँगन में, मांसल बेल कभी तो फूटेगी
ऐसा भी इक दिन आएगा, वो मनाएगा, बन्नो रूठेगी।
मोड़ जो ऐसा आया है तो रुकना, लुत्फ़ उठाना
बोलने वाले जो बोलें, मुझे तो लगता सही है।
ये है सलीका , वह नहीं, कह-कह रूढ़ी हारेगी
मैं भैंस हूँ, पगुराउंगी, वो पत्थर में सर मारेगी।
उस अरण्य में घनघोर हिरनी बनकर
अपने बिम्ब में पंजों को छपकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।
होठों पर अधखिली मुस्कान लिए
कच्चे मन में निर्दोष अरमान लिए
इस शुष्क क्यारी में--
पंखुड़ियों के सूख जाने से पहले
इस शीशे कि चौंध में--
मेरे बिम्ब के पक जाने से पहले
इन बोलती आंखों की अंजुली में शरारत भरकर
गुड़िया के मकान की दीवारों को जमकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।
अभी छुपी हुई हूँ--
लड़कपन की इस मिट्टी को भले चिकनी कह लो
सोंधी महक तो इसी से आती है।
इन छरहरे पांवों में पहली पैंजनिया जब बांधूंगी,
इन छोटे कृष्ण-कान्त बालों में पहली चोटी जब बांधूंगी,
गंगा की लहरों सा मन लेगा हिलोरें
खिलखिलाहट बुझे और अबोध को बाखूब भाती हैं।
उस तट पर जो जल रहा है, क्या मालूम?
मुझे दृष्टिगोचर है उस तपिश में नई धूम।
इस तट से उस तट को जाती नौका पर चढ़कर
बाकी सवारियों से रोकर, मनुहार कर, लड़कर
मैं निहारना चाहती हूँ।।
अभी रुकी हुई हूँ--
कल के स्वच्छंद गगन में विचरण करते पंछियों
मुझे मेरी बेड़ी की छुअन भी तकिये सी लगती है।
काट दूंगी इन बेडियों को, हाँ, काट दूंगी
मुझ पर किसी का कोई हक नहीं।
करूंगी कोशिश, सलामत रहे विचारों की कोमलता
शरीर हांलाकि सख्त हो जाएगा, कोई शक नहीं।
शिखर पर धडधडाती पहुँचती रेल में यूँ जा बैठुंगी,
मुंह-बाए देखते कीडे-मकौडों की आग सेकूंगी और ऐंठूंगी।
इस चकरघिन्नी पर गोल-गोल घूमकर
सागरमाथे को सहलाकर, चूमकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।
अभी खामोश खड़ी हूँ--
मेरी प्रेम कलोल को फिलहाल चीत्कार कह लो,
इन निष्प्राण छत्तों का शहद तो यही है।
भीमकाय नियमों के आँगन में, मांसल बेल कभी तो फूटेगी
ऐसा भी इक दिन आएगा, वो मनाएगा, बन्नो रूठेगी।
मोड़ जो ऐसा आया है तो रुकना, लुत्फ़ उठाना
बोलने वाले जो बोलें, मुझे तो लगता सही है।
ये है सलीका , वह नहीं, कह-कह रूढ़ी हारेगी
मैं भैंस हूँ, पगुराउंगी, वो पत्थर में सर मारेगी।
उस अरण्य में घनघोर हिरनी बनकर
अपने बिम्ब में पंजों को छपकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।
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