फ़र्ज़ कीजिये कि एक छोटी बच्ची अपना अक्स आईने में निहार रही है और मन ही मन सोच रही है...
होठों पर अधखिली मुस्कान लिए
कच्चे मन में निर्दोष अरमान लिए
इस शुष्क क्यारी में--
पंखुड़ियों के सूख जाने से पहले
इस शीशे कि चौंध में--
मेरे बिम्ब के पक जाने से पहले
इन बोलती आंखों की अंजुली में शरारत भरकर
गुड़िया के मकान की दीवारों को जमकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।
अभी छुपी हुई हूँ--
लड़कपन की इस मिट्टी को भले चिकनी कह लो
सोंधी महक तो इसी से आती है।
इन छरहरे पांवों में पहली पैंजनिया जब बांधूंगी,
इन छोटे कृष्ण-कान्त बालों में पहली चोटी जब बांधूंगी,
गंगा की लहरों सा मन लेगा हिलोरें
खिलखिलाहट बुझे और अबोध को बाखूब भाती हैं।
उस तट पर जो जल रहा है, क्या मालूम?
मुझे दृष्टिगोचर है उस तपिश में नई धूम।
इस तट से उस तट को जाती नौका पर चढ़कर
बाकी सवारियों से रोकर, मनुहार कर, लड़कर
मैं निहारना चाहती हूँ।।
अभी रुकी हुई हूँ--
कल के स्वच्छंद गगन में विचरण करते पंछियों
मुझे मेरी बेड़ी की छुअन भी तकिये सी लगती है।
काट दूंगी इन बेडियों को, हाँ, काट दूंगी
मुझ पर किसी का कोई हक नहीं।
करूंगी कोशिश, सलामत रहे विचारों की कोमलता
शरीर हांलाकि सख्त हो जाएगा, कोई शक नहीं।
शिखर पर धडधडाती पहुँचती रेल में यूँ जा बैठुंगी,
मुंह-बाए देखते कीडे-मकौडों की आग सेकूंगी और ऐंठूंगी।
इस चकरघिन्नी पर गोल-गोल घूमकर
सागरमाथे को सहलाकर, चूमकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।
अभी खामोश खड़ी हूँ--
मेरी प्रेम कलोल को फिलहाल चीत्कार कह लो,
इन निष्प्राण छत्तों का शहद तो यही है।
भीमकाय नियमों के आँगन में, मांसल बेल कभी तो फूटेगी
ऐसा भी इक दिन आएगा, वो मनाएगा, बन्नो रूठेगी।
मोड़ जो ऐसा आया है तो रुकना, लुत्फ़ उठाना
बोलने वाले जो बोलें, मुझे तो लगता सही है।
ये है सलीका , वह नहीं, कह-कह रूढ़ी हारेगी
मैं भैंस हूँ, पगुराउंगी, वो पत्थर में सर मारेगी।
उस अरण्य में घनघोर हिरनी बनकर
अपने बिम्ब में पंजों को छपकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।
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