सोमवार, 11 मई 2009

मैं निहारना चाहती हूँ

फ़र्ज़ कीजिये कि एक छोटी बच्ची अपना अक्स आईने में निहार रही है और मन ही मन सोच रही है...

होठों पर अधखिली मुस्कान लिए
कच्चे मन में निर्दोष अरमान लिए
इस शुष्क क्यारी में--
पंखुड़ियों के सूख जाने से पहले
इस शीशे कि चौंध में--
मेरे बिम्ब के पक जाने से पहले
इन बोलती आंखों की अंजुली में शरारत भरकर
गुड़िया के मकान की दीवारों को जमकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।

अभी छुपी हुई हूँ--
लड़कपन की इस मिट्टी को भले चिकनी कह लो
सोंधी महक तो इसी से आती है।
इन छरहरे पांवों में पहली पैंजनिया जब बांधूंगी,
इन छोटे कृष्ण-कान्त बालों में पहली चोटी जब बांधूंगी,
गंगा की लहरों सा मन लेगा हिलोरें
खिलखिलाहट बुझे और अबोध को बाखूब भाती हैं।
उस तट पर जो जल रहा है, क्या मालूम?
मुझे दृष्टिगोचर है उस तपिश में नई धूम।
इस तट से उस तट को जाती नौका पर चढ़कर
बाकी सवारियों से रोकर, मनुहार कर, लड़कर
मैं निहारना चाहती हूँ।।

अभी रुकी हुई हूँ--
कल के स्वच्छंद गगन में विचरण करते पंछियों
मुझे मेरी बेड़ी की छुअन भी तकिये सी लगती है।
काट दूंगी इन बेडियों को, हाँ, काट दूंगी
मुझ पर किसी का कोई हक नहीं।
करूंगी कोशिश, सलामत रहे विचारों की कोमलता
शरीर हांलाकि सख्त हो जाएगा, कोई शक नहीं।
शिखर पर धडधडाती पहुँचती रेल में यूँ जा बैठुंगी,
मुंह-बाए देखते कीडे-मकौडों की आग सेकूंगी और ऐंठूंगी।
इस चकरघिन्नी पर गोल-गोल घूमकर
सागरमाथे को सहलाकर, चूमकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।

अभी खामोश खड़ी हूँ--
मेरी प्रेम कलोल को फिलहाल चीत्कार कह लो,
इन निष्प्राण छत्तों का शहद तो यही है।
भीमकाय नियमों के आँगन में, मांसल बेल कभी तो फूटेगी
ऐसा भी इक दिन आएगा, वो मनाएगा, बन्नो रूठेगी।
मोड़ जो ऐसा आया है तो रुकना, लुत्फ़ उठाना
बोलने वाले जो बोलें, मुझे तो लगता सही है।
ये है सलीका , वह नहीं, कह-कह रूढ़ी हारेगी
मैं भैंस हूँ, पगुराउंगी, वो पत्थर में सर मारेगी।
उस अरण्य में घनघोर हिरनी बनकर
अपने बिम्ब में पंजों को छपकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।

बुधवार, 6 मई 2009

अजीब कविता

प्रस्तुत है एक ऐसी कविता..जो कोई भी व्यक्ति तब लिखता है जब मन बहुत परेशां हो और भड़ास निकलना चाहता हो..ऐसे में मन के भाव व्यवस्थित होकर नही आते..और तब अजीब काव्य का जन्म होता है।

अजीब है ये सबक,
जब यूँ ही कलम चल पड़ी है,
और कुछ भाव जो की
दिल के किसी कोने-अंतरे में पड़े हैं
उफना रहे हैं।

गोरी ठिठुरती सुबहों में
चाँदनी का गान सुन
कान हैरान हैं।
और चौंक उठती हैं निगाहें
उजाड़ में कुछ हरा-भरा देखकर।

वो मुस्कान जो खेल रही है
अभी दो साल के होठों पर।
कल चल के आढ़ी-टेढ़ी राहों पर
घिसी जाएगी।
फिर अगर पानी न निकला
तो वाही सादगी बरक़रार रह जाएगी।

वैसे मुस्कान तो उनकी भी दिलकश है,
जो गंगा किनारे बैठ, उगता सूरज देख रहे हैं।
पकड़ के पिंजरे में कोई कितना बंद कर ले,
पर खुले में शेरनी की लीला गज़ब दिखती है।

टोपी सीधी नहीं है,
बर्फ सी मोटी, जमी हुई पर बह रही है।
गलियों में, जो पुरानी हैं और नई भी।

जिल्द चढी है, तो धुल भी जमी होगी।
उन्हें साफ़ करने का समय है।
खोल कर अन्दर झाँकने का समय है।
शायद मन में भी।

तकिये पर पैर रख कर
उछलो तो कहाँ तक पहुँचोगे?
पक्की ज़मीं ज़रूरी है
ऊँची उछाल के लिए।

हाँ गलियां हैं,
गलियों की बात की थी।
गलियों में नालियां हैं,
और नालियों में बहता वो सब कुछ
जो बह सकता है।
पानी, दूध, खून, लाशें।
कुछ चुनना चाहो तो चुन लो,
सब लावारिस हैं।

शेर की याद आई,
पंजे उसके जमे हैं,
शहीदों की मूर्तियों पर।
वो बंदूकें जिनमें जंग लग है,
उनमे जवानी का टीका लगा दो।

डर लग रहा है,
कहीं मारोगे तो नहीं।
नहीं, तुम तो झूम रहे हो,
शराब में, संगीत पे।
नई शाम है,
कलेंडर बदलने का समय है।

चलो ख़त्म करते हैं,
जितना हवा दो,
ये अंगारे और भड़कते हैं।
इससे पहले ये आग मुझे जला डाले,
इसपे पानी डाल देते हैं।

हिन्दुस्तानी हम नहीं

फिलवक्त भारत में चुनावी माहौल है...हिंदुस्तान की अवाम के पास सुनहरा मौका है जो बिगड़ा है उसे सुधारने का...ऐसे जन-प्रतिनिधियों को चुनने का जो कि देश को उन्नति के पथ पर दौड़ाएँ...परन्तु ऐसे में जब मात्र ३०-४० फीसदी मतदान किसी चुनाव-क्षेत्र से सुनाने में आता है तो हुज़ूर खून खौल उठता है...आख़िर कब हम अपने मत की ताक़त को समझ पाएँगे...इसी आवेश को झलकाती मेरी नई कविता...

वो कौन जो दुश्मन है तेरा,
दुश्मनों में हम भी हैं।
खूँरेज़ कातिलो की ये भीड़,
कातिलो में हम भी हैं।
कैफियत तो दूर है,
अब दिल्लगी का दम नही।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नही।

रूढ़ी की जाली अभी तक,
फट चुका आँचल वहीं।
सूखे लबों से लिपटा खून,
अब तलक पोछा नहीं।
सरफरोशों की है तंगी,
सिरफिरे हैं कम नहीं।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं।

मान कर सोना जिसे
जीभ लपलपाते राख है।
चार दिन की चांदनी है,
फिर अँधेरा पाख है।
देख बन्दे, गंगा ज़हर है
कावेरी मरहम नहीं।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं।

कल सिसकता आज पर,
आज कल से उदासीन।
चीरती थी जो निगाहें,
आज मद के हैं अधीन।
ये लचर बाहें हैं, इनमे
बाजुओं सा ख़म नहीं।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं

बज रही चहुँओर दुन्दुभी,
गूंजती है इक हुँकार।
उद्घोष करता है प्रकम्पित,
उस ज्वार का वो अगला वार।
आक्रोश की तलवार कुंद है,
चीख है गर्जन नहीं।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं

भड़क उठी है इक चिंगारी,
बढ़ चला है इक सैलाब।
याद कर माजी को अपने,
और चिल्ला 'इन्कलाब'।
आज है दौर-ऐ-जुनूँ,
मुल्क मांगे फिर तिलक वही।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं