बुधवार, 6 मई 2009

अजीब कविता

प्रस्तुत है एक ऐसी कविता..जो कोई भी व्यक्ति तब लिखता है जब मन बहुत परेशां हो और भड़ास निकलना चाहता हो..ऐसे में मन के भाव व्यवस्थित होकर नही आते..और तब अजीब काव्य का जन्म होता है।

अजीब है ये सबक,
जब यूँ ही कलम चल पड़ी है,
और कुछ भाव जो की
दिल के किसी कोने-अंतरे में पड़े हैं
उफना रहे हैं।

गोरी ठिठुरती सुबहों में
चाँदनी का गान सुन
कान हैरान हैं।
और चौंक उठती हैं निगाहें
उजाड़ में कुछ हरा-भरा देखकर।

वो मुस्कान जो खेल रही है
अभी दो साल के होठों पर।
कल चल के आढ़ी-टेढ़ी राहों पर
घिसी जाएगी।
फिर अगर पानी न निकला
तो वाही सादगी बरक़रार रह जाएगी।

वैसे मुस्कान तो उनकी भी दिलकश है,
जो गंगा किनारे बैठ, उगता सूरज देख रहे हैं।
पकड़ के पिंजरे में कोई कितना बंद कर ले,
पर खुले में शेरनी की लीला गज़ब दिखती है।

टोपी सीधी नहीं है,
बर्फ सी मोटी, जमी हुई पर बह रही है।
गलियों में, जो पुरानी हैं और नई भी।

जिल्द चढी है, तो धुल भी जमी होगी।
उन्हें साफ़ करने का समय है।
खोल कर अन्दर झाँकने का समय है।
शायद मन में भी।

तकिये पर पैर रख कर
उछलो तो कहाँ तक पहुँचोगे?
पक्की ज़मीं ज़रूरी है
ऊँची उछाल के लिए।

हाँ गलियां हैं,
गलियों की बात की थी।
गलियों में नालियां हैं,
और नालियों में बहता वो सब कुछ
जो बह सकता है।
पानी, दूध, खून, लाशें।
कुछ चुनना चाहो तो चुन लो,
सब लावारिस हैं।

शेर की याद आई,
पंजे उसके जमे हैं,
शहीदों की मूर्तियों पर।
वो बंदूकें जिनमें जंग लग है,
उनमे जवानी का टीका लगा दो।

डर लग रहा है,
कहीं मारोगे तो नहीं।
नहीं, तुम तो झूम रहे हो,
शराब में, संगीत पे।
नई शाम है,
कलेंडर बदलने का समय है।

चलो ख़त्म करते हैं,
जितना हवा दो,
ये अंगारे और भड़कते हैं।
इससे पहले ये आग मुझे जला डाले,
इसपे पानी डाल देते हैं।

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