फिलवक्त भारत में चुनावी माहौल है...हिंदुस्तान की अवाम के पास सुनहरा मौका है जो बिगड़ा है उसे सुधारने का...ऐसे जन-प्रतिनिधियों को चुनने का जो कि देश को उन्नति के पथ पर दौड़ाएँ...परन्तु ऐसे में जब मात्र ३०-४० फीसदी मतदान किसी चुनाव-क्षेत्र से सुनाने में आता है तो हुज़ूर खून खौल उठता है...आख़िर कब हम अपने मत की ताक़त को समझ पाएँगे...इसी आवेश को झलकाती मेरी नई कविता...
वो कौन जो दुश्मन है तेरा,
दुश्मनों में हम भी हैं।
खूँरेज़ कातिलो की ये भीड़,
कातिलो में हम भी हैं।
कैफियत तो दूर है,
अब दिल्लगी का दम नही।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नही।
रूढ़ी की जाली अभी तक,
फट चुका आँचल वहीं।
सूखे लबों से लिपटा खून,
अब तलक पोछा नहीं।
सरफरोशों की है तंगी,
सिरफिरे हैं कम नहीं।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं।
मान कर सोना जिसे
जीभ लपलपाते राख है।
चार दिन की चांदनी है,
फिर अँधेरा पाख है।
देख बन्दे, गंगा ज़हर है
कावेरी मरहम नहीं।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं।
कल सिसकता आज पर,
आज कल से उदासीन।
चीरती थी जो निगाहें,
आज मद के हैं अधीन।
ये लचर बाहें हैं, इनमे
बाजुओं सा ख़म नहीं।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं।
बज रही चहुँओर दुन्दुभी,
गूंजती है इक हुँकार।
उद्घोष करता है प्रकम्पित,
उस ज्वार का वो अगला वार।
आक्रोश की तलवार कुंद है,
चीख है गर्जन नहीं।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं।
भड़क उठी है इक चिंगारी,
बढ़ चला है इक सैलाब।
याद कर माजी को अपने,
और चिल्ला 'इन्कलाब'।
आज है दौर-ऐ-जुनूँ,
मुल्क मांगे फिर तिलक वही।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं।
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