उषा में नहाई सुबह
अपने आगोश में,
पावन उर्जा समेटे हुए
जैसे मेरे ही लिए,
साँसों में ग्रीष्मा भरे
कंगूरे पे आ खड़ी हुई।
मुझे टटोल के
मुझे मद के आँगन से
खींच रही है पगली।
आँखें मलता मैं
जिद पे अड़ा हूँ,
चौखट पे खड़ा हूँ।
पर वो भी कुछ कम ढीठ नही;
अपनी सहस्त्र भंगिमाओं से
मुझे लुभा रही है।
अपनी लहक से, चूडियों की खनक से
मुझे बुला रही है।
हाय, वो कौमार्य की देवी
मुझमें काम जागृत कर रही है।
उफ़, उसने सहलाया मेरा माथा,
सरसरी सी दौड़ गई।
माथे पर उन्माद की कुछ बूँदें
अनायास ही उभर गईं।
वह सुनयना, ब्रह्माण्ड सुन्दरी
आज क्रीड़ा हेतु उतावली है,
अरे बावली है
जो मुझमें अपना तेज बो रही है।
मेरे सुषुप्त अंग-अंग को
अपनी सुरा से धो रही है।
लो मैं हार गया हूँ।
चेतना को मला बना
सीने से लगा चुका हूँ।
पर वो सुन्दरी,
वो मोहिनी, तेजस्विनी,
क्यूँ अब दूर जा रही है?
ओह, वो एक इशारा था;
अपनी पलक की झपक से
वो मुहे बुला रही है,
अपने पथ पर चलने को
उकसा रही है।
हाय, वह मेरी संपूर्ण हस्ती की
ठकुरानी बन बैठी है,
और मैं उसके लावण्य के वशीभूत
चला जा रहा हूँ, चला जा रहा हूँ।
संपूर्ण सृष्टि मानो
उस ओजस्विनी की प्रभा में
सराबोर नृत्य कर रही है।
नभचरों का क्रंदन, थलचरों की पदचाप
सब सुर हैं, संगीत हैं।
और इस धुन में,
हरे तो हरे,
जैसे पथरीले भी झूम रहे हैं।
कहीं ये मधुरता, ये सुरम्यता
कोई जाल तो नही?
या किसी कुटिल कलाकार की कोई
चाल तो नही?
ओह, मेरी पटरानी का आभामंडल
फ़ैल रहा है।
चरों और अप्सराएं ही अप्सराएं
मादक नृत्य कर रही हैं।
क्या प्राणी, क्या प्राणहीन
सब मजबूर हैं, मद मेंन चूर हैं।
ओह, ये कोई दिवास्वप्न है,
मैं शायद फिर
तंद्रा के आँगन में लौट आया हूँ।
पर रहने दो,
मोहे झिंझोड़ना मत।
अरे मैं ठहरा सौंदर्य का पुजारी,
जैसे वो कुसुम और मैं भ्रमर।
मेरी साम्राज्ञी ने मार्ग प्रशस्त कर दिया है,
और मैं मधुबन को उड़ने को तैयार हो चुका हूँ।
3 टिप्पणियां:
आपके ब्लाग का शीर्षक देखकर ही मैंने सोचा कि शायद इस पर हिंदी साहित्य से जुड़े लेख के दर्शन होंगे। खैर आपके अगले लेख की प्रतीक्षा करूंगा।
श्याम बाबू शर्मा
http://shyamgkp.blogspot.com
चिटठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है आपके लेखन के लिए हार्दिक शुभकामनाएं ...........
narayan...narayan
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