शनिवार, 12 दिसंबर 2009

प्रियंका को समर्पित

यह कविता उभरती कलाकार प्रियंका शर्मा की कला व उनकी बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर उनकी प्रशंसा हेतु लिखी गई है...आशा है की उनको पसंद आयेगी...

जंग खा चुके भावों की
नई परिभाषाएं खोजती हो,
कुछ ललक है तुम्हारी आँखों में
बड़ा नया-नया सा सोचती हो .

तुम कूची की जादूगरनी,
कुछ मायाजाल सा रचती हो.
निर्मोही इन रंगों का,
एक मोहपाश सा कसती हो.
बियाबान है ये सड़क; बेरंग निगाहें पथराई,
निष्प्राण, निरे इन मनों को
तुम कूची से ही कोंचती हो.
कुछ ललक है तुम्हारी आँखों में
बड़ा नया-नया सा सोचती हो.

आकृतियों में आकांक्षा है,
एक चाह है नूर को पाने की.
ज्यामितीय सीमाओं को ये लांघती हैं,
जैसे ग़ज़ल हों बीते ज़माने की.
छटाओं में सुर है; सूरा है,
उपमाओं के इन्द्रधनुष से
परिदृश्य सलोना खेंचती हो.
कुछ ललक है तुम्हारी आँखों में,
बड़ा नया-नया सा सोचती हो.

उल्लास है वीणा की तारों में,
उत्कंठा गेरू में खेलने की.
आकांक्षा अनूठी, उभरे वक्षों को,
नन्ही साँसों की ऊष्मा झेलने की.
अनवरत अनगिनत रेखाओं से,
अफ्लाक बेदाग तुम रचती हो.
तुम्हारी परतों में झांकना धन्यकारी है,
क्यूंकि नया-नया तुम सोचती हो.

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

चंदा चकोर

एक बेहतरीन शेर को आज अपना बनाने का दिल कर रहा है
राज़दां कुछ किताबों पर से गर्त साफ़ करने का दिल कर रहा है
चिलमन के पार से झांकती भूरी आंखों के सदके
क़सीदे-पे-क़सीदे गढ़ने का दिल कर रहा है ।

ऊपर के शेर के बहाव में बहते हुए पेश है मेरी एक और कविता जो मेरी प्रियतमा को समर्पित है।

शब है रूमानी सी...
दूधिया रोशनी में नहाये
पेड़ की सबसे ऊँची टहनी पर
पत्तों की ओट से
मैं और मेरा चित्त, चकोर
अपनी विहंगम सुन्दरता में अलमस्त
चंदा को निहार रहे हैं।

आज चंदा की आभा भी देखते बनती है
चकोर उसकी लीलाएं देख हैरान है
स्वच्छंद आकाश में वो यूँ चक्कर लगा रही है
जैसे वह उसका क्रीड़ास्थल हो
अपनी भीगी चाँदनी बरसाती यूँ ऐंठ रही है
जैसे कोई नव-विवाहिता
पूर्ण साज-ओ-श्रृगार की प्रभा से दमकती हो।

हाँ, वो नव-विवाहिता ही तो है,
चकोर सोचता है
कितनी कोमल, कितनी निर्मल
शायद ये हवा ही तो है
जो उसके घूँघट को उड़ा रही है
और उसके सलोने चहरे का सोना
बड़ी कमनीयता से उजागर कर रही है।
और चकोर इस नर्म हवा को अपनी साँसों में भरकर
अपने तन-मन में बसा लेना चाहता है।

हाय, वह बेचारा भी क्या करे,
ये खामोश अनिल ही तो एक माध्यम है
उसकी चंचल शीतलता को
संपूर्ण लावण्या समेत
चकोर के चाक दामन में उड़ेलने का।

चकोर को अपनी क्षुद्रता का
और चंदा की उच्चता का भान है।
यह भी ज्ञान है
की वह चाहे जितना चाह ले
उस तक उड़कर नही पहुँच सकता।
पर क्या यह स्पष्ट कारण
इतना महान है
कि प्रेम की उछाल को रोक दे?

इस धवल आकाश म
अपनी प्रियतमा की छवि अघोरता
वह प्रेममयी तरंगो में
डूबने-उतरने में व्यस्त है।
क्या फर्क पड़े है?
क्या फर्क पड़े है
जो ये आधा अधूरा मिलन पूरा न हो पाये।
वह तो अपनी मानिनी के विस्तार में मस्त है।
जो आत्माएं मिल जाएँ तो तन मिले न मिले
मन में उठे अरमानो के ज्वार स्वतः
ह्रदय-गंगा में समाहित हो जायेंगे।

पर चकोर तू शांत न रह
चिरस्थायी नही है यह पूर्णिमा।
कृष्ण-पक्ष अभी बाकी है
जब तुझे तेरी चंदा की झांकी तो क्या
झलक तक नसीब न होगी
फ़िर किसे ताकेगा,
ह्रदय की आँहों को
किसकी गर्माहट में तपाएगा।

होइहै वाही जो राम रचि राखा
चकोर संतुष्टि से कहता है।
हाथ-पाँव मारा, हर रण, हर छोर हारा
तब जाके यह सीखा है
कोशिशों में समय क्यूँ व्यर्थ करूँ,
ये जीवन ही अल्पायु है
मैं एकाग्रचित्त अपनी वत्सला के दर्शन में मग्न हूँ
हटो, मुझे किंचित विमुख न करो।

कहकर चकोर फ़िर डूब गया
अपनी स्वामिनी के रस में
चलो अब कथा समाप्त करते हैं
इन्हे अकेला छोड़ देते हैं
ये मिलन इनका है, इन्हे ही तय करने दो
की ये किस्से को क्या खूबसूरत मोड़ देते हैं।

गुरुवार, 11 जून 2009

पथिक

हूँ पथिक मैं||

चल पडा हूँ उस राह पर,
जो राह है मेरे माही की|
दिल के कोने-अंतरे में प्रतिष्ठापित
मेरे नादाँ इलाही की|

राहें तो वो भी लाख हसीं हैं
जो भरमा रही है; देह को तबीयत से सहला रही हैं|
पर जी इस ढीठ मन का क्या करें,
कमबख्त को इन पथरीली राहों की चुभन भी भा रही है|

हाँ पथिक मैं||

था कांपता इस राह से,
इसमे मुझे मेरा अक्स दिखाई देता है|
मन की परतों में जिसे पीताम्बर से ढँक रखा था,
वो शैतान नग्न हो सामने आता है|

पर हाय, उसकी पुकार को कैसे नज़रंदाज़ करूं
जो उस पार खड़ा मेरी जुदाई सह रहा है|
थरथराती, कांपती मेरी टांगों को
महासागर, भवसागर, फांद जाने को कह रहा है|

यूं डूबने का तो डर है|
पर कभी-न-कभी तो डूबना ही है,
स्वेच्छा से डूब लूँ
रस लेना ही तो निमित्त भर है|

वाह! पथिक मैं||

वो कहता है एक दिन आएगा
जब वो मेरा,
मैं उसका हो जाऊँगा|
माया का गुरुत्व धरा-का-धरा रह जाएगा,
मैं सारी रस्सियाँ काट कर बादल हो जाऊँगा|

एक बादल बन जाऊँगा,
इन-उन, सब राहों पर लहराऊंगा|
पर अब किसी की गर्द मुझे छू पाएगी,
मेरा दामन सूरज का नूर हो जाएगा|

वो कहता है मैं भागीदार ना रह जाऊँगा,
वो मानता है मैं मुरक़िब बन जाऊँगा|
राहों की इस भूल-भुलैया में,
सिरा तलाशते जिस्म पर जोर-जोर ठहाके लगाऊंगा|

वाह! पथिक मैं||

शरीर; इसका कोई अर्थ ना रह जाएगा|
मन; वो अर्थ के परे हो जाएगा|
ये राह, इसका सफ़र, सब सार्थक हो जाएगा
बस जो मेरा माही मुझमे खिल जाएगा|

भंवर में पता हो जाएगा,
बवंडर ठिकाना बन जाएगा|
मेरे नादाँ इलाही की सूरत जिसमे नज़ीर हो,
वही मेरा जहां, मेरा आशियाना हो जाएगा|

बस पथिक मैं||

पर तब तक चलना ही एक काम है,
प्रीतम का दिया प्रदीप्त किये बिना कहाँ चैन, किधर आराम है?
उससे लौ लगाए हुए,
कंकड़ों पे बहते जाना अब सुबह--शाम है|

पथ लम्बा है, संकरा है, गहरा है, शायद अंतहीन है|
इधर बस मैं और मेरी प्रीत है|
सरसराती हवा, पर, गुनगुना रही है,
"जो थक-हार के ना बैठा, हे पथिक,
शब आने तक गंतव्य नज़दीक है|"

मंगलवार, 2 जून 2009

सोमवार, 11 मई 2009

मैं निहारना चाहती हूँ

फ़र्ज़ कीजिये कि एक छोटी बच्ची अपना अक्स आईने में निहार रही है और मन ही मन सोच रही है...

होठों पर अधखिली मुस्कान लिए
कच्चे मन में निर्दोष अरमान लिए
इस शुष्क क्यारी में--
पंखुड़ियों के सूख जाने से पहले
इस शीशे कि चौंध में--
मेरे बिम्ब के पक जाने से पहले
इन बोलती आंखों की अंजुली में शरारत भरकर
गुड़िया के मकान की दीवारों को जमकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।

अभी छुपी हुई हूँ--
लड़कपन की इस मिट्टी को भले चिकनी कह लो
सोंधी महक तो इसी से आती है।
इन छरहरे पांवों में पहली पैंजनिया जब बांधूंगी,
इन छोटे कृष्ण-कान्त बालों में पहली चोटी जब बांधूंगी,
गंगा की लहरों सा मन लेगा हिलोरें
खिलखिलाहट बुझे और अबोध को बाखूब भाती हैं।
उस तट पर जो जल रहा है, क्या मालूम?
मुझे दृष्टिगोचर है उस तपिश में नई धूम।
इस तट से उस तट को जाती नौका पर चढ़कर
बाकी सवारियों से रोकर, मनुहार कर, लड़कर
मैं निहारना चाहती हूँ।।

अभी रुकी हुई हूँ--
कल के स्वच्छंद गगन में विचरण करते पंछियों
मुझे मेरी बेड़ी की छुअन भी तकिये सी लगती है।
काट दूंगी इन बेडियों को, हाँ, काट दूंगी
मुझ पर किसी का कोई हक नहीं।
करूंगी कोशिश, सलामत रहे विचारों की कोमलता
शरीर हांलाकि सख्त हो जाएगा, कोई शक नहीं।
शिखर पर धडधडाती पहुँचती रेल में यूँ जा बैठुंगी,
मुंह-बाए देखते कीडे-मकौडों की आग सेकूंगी और ऐंठूंगी।
इस चकरघिन्नी पर गोल-गोल घूमकर
सागरमाथे को सहलाकर, चूमकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।

अभी खामोश खड़ी हूँ--
मेरी प्रेम कलोल को फिलहाल चीत्कार कह लो,
इन निष्प्राण छत्तों का शहद तो यही है।
भीमकाय नियमों के आँगन में, मांसल बेल कभी तो फूटेगी
ऐसा भी इक दिन आएगा, वो मनाएगा, बन्नो रूठेगी।
मोड़ जो ऐसा आया है तो रुकना, लुत्फ़ उठाना
बोलने वाले जो बोलें, मुझे तो लगता सही है।
ये है सलीका , वह नहीं, कह-कह रूढ़ी हारेगी
मैं भैंस हूँ, पगुराउंगी, वो पत्थर में सर मारेगी।
उस अरण्य में घनघोर हिरनी बनकर
अपने बिम्ब में पंजों को छपकर
मैं निहारना चाहती हूँ।।

बुधवार, 6 मई 2009

अजीब कविता

प्रस्तुत है एक ऐसी कविता..जो कोई भी व्यक्ति तब लिखता है जब मन बहुत परेशां हो और भड़ास निकलना चाहता हो..ऐसे में मन के भाव व्यवस्थित होकर नही आते..और तब अजीब काव्य का जन्म होता है।

अजीब है ये सबक,
जब यूँ ही कलम चल पड़ी है,
और कुछ भाव जो की
दिल के किसी कोने-अंतरे में पड़े हैं
उफना रहे हैं।

गोरी ठिठुरती सुबहों में
चाँदनी का गान सुन
कान हैरान हैं।
और चौंक उठती हैं निगाहें
उजाड़ में कुछ हरा-भरा देखकर।

वो मुस्कान जो खेल रही है
अभी दो साल के होठों पर।
कल चल के आढ़ी-टेढ़ी राहों पर
घिसी जाएगी।
फिर अगर पानी न निकला
तो वाही सादगी बरक़रार रह जाएगी।

वैसे मुस्कान तो उनकी भी दिलकश है,
जो गंगा किनारे बैठ, उगता सूरज देख रहे हैं।
पकड़ के पिंजरे में कोई कितना बंद कर ले,
पर खुले में शेरनी की लीला गज़ब दिखती है।

टोपी सीधी नहीं है,
बर्फ सी मोटी, जमी हुई पर बह रही है।
गलियों में, जो पुरानी हैं और नई भी।

जिल्द चढी है, तो धुल भी जमी होगी।
उन्हें साफ़ करने का समय है।
खोल कर अन्दर झाँकने का समय है।
शायद मन में भी।

तकिये पर पैर रख कर
उछलो तो कहाँ तक पहुँचोगे?
पक्की ज़मीं ज़रूरी है
ऊँची उछाल के लिए।

हाँ गलियां हैं,
गलियों की बात की थी।
गलियों में नालियां हैं,
और नालियों में बहता वो सब कुछ
जो बह सकता है।
पानी, दूध, खून, लाशें।
कुछ चुनना चाहो तो चुन लो,
सब लावारिस हैं।

शेर की याद आई,
पंजे उसके जमे हैं,
शहीदों की मूर्तियों पर।
वो बंदूकें जिनमें जंग लग है,
उनमे जवानी का टीका लगा दो।

डर लग रहा है,
कहीं मारोगे तो नहीं।
नहीं, तुम तो झूम रहे हो,
शराब में, संगीत पे।
नई शाम है,
कलेंडर बदलने का समय है।

चलो ख़त्म करते हैं,
जितना हवा दो,
ये अंगारे और भड़कते हैं।
इससे पहले ये आग मुझे जला डाले,
इसपे पानी डाल देते हैं।

हिन्दुस्तानी हम नहीं

फिलवक्त भारत में चुनावी माहौल है...हिंदुस्तान की अवाम के पास सुनहरा मौका है जो बिगड़ा है उसे सुधारने का...ऐसे जन-प्रतिनिधियों को चुनने का जो कि देश को उन्नति के पथ पर दौड़ाएँ...परन्तु ऐसे में जब मात्र ३०-४० फीसदी मतदान किसी चुनाव-क्षेत्र से सुनाने में आता है तो हुज़ूर खून खौल उठता है...आख़िर कब हम अपने मत की ताक़त को समझ पाएँगे...इसी आवेश को झलकाती मेरी नई कविता...

वो कौन जो दुश्मन है तेरा,
दुश्मनों में हम भी हैं।
खूँरेज़ कातिलो की ये भीड़,
कातिलो में हम भी हैं।
कैफियत तो दूर है,
अब दिल्लगी का दम नही।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नही।

रूढ़ी की जाली अभी तक,
फट चुका आँचल वहीं।
सूखे लबों से लिपटा खून,
अब तलक पोछा नहीं।
सरफरोशों की है तंगी,
सिरफिरे हैं कम नहीं।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं।

मान कर सोना जिसे
जीभ लपलपाते राख है।
चार दिन की चांदनी है,
फिर अँधेरा पाख है।
देख बन्दे, गंगा ज़हर है
कावेरी मरहम नहीं।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं।

कल सिसकता आज पर,
आज कल से उदासीन।
चीरती थी जो निगाहें,
आज मद के हैं अधीन।
ये लचर बाहें हैं, इनमे
बाजुओं सा ख़म नहीं।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं

बज रही चहुँओर दुन्दुभी,
गूंजती है इक हुँकार।
उद्घोष करता है प्रकम्पित,
उस ज्वार का वो अगला वार।
आक्रोश की तलवार कुंद है,
चीख है गर्जन नहीं।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं

भड़क उठी है इक चिंगारी,
बढ़ चला है इक सैलाब।
याद कर माजी को अपने,
और चिल्ला 'इन्कलाब'।
आज है दौर-ऐ-जुनूँ,
मुल्क मांगे फिर तिलक वही।
हिंदुस्ताँ ये वही है लेकिन
हिन्दुस्तानी हम नहीं

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

मेरी सुबह

उषा में नहाई सुबह
अपने आगोश में,
पावन उर्जा समेटे हुए
जैसे मेरे ही लिए,
साँसों में ग्रीष्मा भरे
कंगूरे पे आ खड़ी हुई।

मुझे टटोल के
मुझे मद के आँगन से
खींच रही है पगली।
आँखें मलता मैं
जिद पे अड़ा हूँ,
चौखट पे खड़ा हूँ।
पर वो भी कुछ कम ढीठ नही;
अपनी सहस्त्र भंगिमाओं से
मुझे लुभा रही है।
अपनी लहक से, चूडियों की खनक से
मुझे बुला रही है।
हाय, वो कौमार्य की देवी
मुझमें काम जागृत कर रही है।

उफ़, उसने सहलाया मेरा माथा,
सरसरी सी दौड़ गई।
माथे पर उन्माद की कुछ बूँदें
अनायास ही उभर गईं।
वह सुनयना, ब्रह्माण्ड सुन्दरी
आज क्रीड़ा हेतु उतावली है,
अरे बावली है
जो मुझमें अपना तेज बो रही है।
मेरे सुषुप्त अंग-अंग को
अपनी सुरा से धो रही है।

लो मैं हार गया हूँ।
चेतना को मला बना
सीने से लगा चुका हूँ।
पर वो सुन्दरी,
वो मोहिनी, तेजस्विनी,
क्यूँ अब दूर जा रही है?
ओह, वो एक इशारा था;
अपनी पलक की झपक से
वो मुहे बुला रही है,
अपने पथ पर चलने को
उकसा रही है।
हाय, वह मेरी संपूर्ण हस्ती की
ठकुरानी बन बैठी है,
और मैं उसके लावण्य के वशीभूत
चला जा रहा हूँ, चला जा रहा हूँ।

संपूर्ण सृष्टि मानो
उस ओजस्विनी की प्रभा में
सराबोर नृत्य कर रही है।
नभचरों का क्रंदन, थलचरों की पदचाप
सब सुर हैं, संगीत हैं।
और इस धुन में,
हरे तो हरे,
जैसे पथरीले भी झूम रहे हैं।
कहीं ये मधुरता, ये सुरम्यता
कोई जाल तो नही?
या किसी कुटिल कलाकार की कोई
चाल तो नही?

ओह, मेरी पटरानी का आभामंडल
फ़ैल रहा है।
चरों और अप्सराएं ही अप्सराएं
मादक नृत्य कर रही हैं।
क्या प्राणी, क्या प्राणहीन
सब मजबूर हैं, मद मेंन चूर हैं।
ओह, ये कोई दिवास्वप्न है,
मैं शायद फिर
तंद्रा के आँगन में लौट आया हूँ।

पर रहने दो,
मोहे झिंझोड़ना मत।
अरे मैं ठहरा सौंदर्य का पुजारी,
जैसे वो कुसुम और मैं भ्रमर।
मेरी साम्राज्ञी ने मार्ग प्रशस्त कर दिया है,
और मैं मधुबन को उड़ने को तैयार हो चुका हूँ।

रविवार, 12 अप्रैल 2009

नज़्म

किसी तहरीर का फायदा ही क्या
जब कचहरी से बाशिंदे ही गायब है?
दिल पे दस्तक की रपट लिखाए हम
हाथ में शिकायतें लिए खड़े हैं।

रब ने जब सनम को बनाया,
दिल तो दिया हुज़ूर को पर
शऊर-ऐ-इस्तेमाल ना सिखाया।
अब धड़क के ये दिल जब ज़रा दखल बढाता है,
वाह तेरी रुखाई कमबख्त, कुँए से प्यासा चार कदम दूर रह जाता है।
पर हम भी साहब हद ढीठ हैं,
जंग लगे बंद दरवाजों के सामने
आस लगाए अपलक अड़े हैं।
पर हाथ में शिकायते लिए खड़े हैं।

धुएँ में उड़ रही है उम्मीदे ऎसी
जैसे पतझड़ में टूटे पत्तों के समंदर।
मजार पे मायूस खड़ा मैं देख रहा,
चारों तरफ़ रंगीनियों का मंज़र।
अब स्याही इन गलियों में
दिन दुनी रात चौगुनी फ़ैल रही है,
ओ मेरे नादान इलाही
मेरी मिल्कियत एक तू ही, तेरी ही कमी है।
तेरे कुचे की मेरी हस्ती में गहरी सिली हुई जड़ें हैं,
और हाथ में शिकायतें लिए खड़े हैं।

बुत-परस्ती गर गुनाह है, तो हुज़ूर इन कन्धों पर सलीब धरो
सरेआम गुनाह कबूल है।
बूंद-बूंद भरे इस पैमाने पर नूर निहाल है,
मय भरा हो, तेजाब
सब कुबूल है।
सुन्न करने वाले चश्मा-ऐ-इश्क
फ़िक्र किसे, उसकी लौ के सहारे खड़े हैं।
पर हाथ में शिकायतें लिए खड़े हैं।

मेरी नई कविता

शून्य मे ताकूँ
तो दुनिया अलग दिखाई देती है।

मेरा शून्य आक्रांत है, तेरा क्लांत है,
कभी अनहद नाद, कभी पूर्ण शांत है।
शून्य सरल है यह, वह विविध है,
उम्मीदों की तकिया, या तीरों से बिध है।

अनेक हैं शून्य में गर्मी की लपटें,
हर लपट मे तलाश लो एक आसरा।
भूत के भूत को पीछे छोड़,
तय करो भविष्य में लंबा फासला।

जो आराम है मेरे शून्य में, तो आँधी भी है,
शान्ति की पिपिहरी बजाते गांधी भी हैं।
शून्य में ग़ौर से देखो, ब्रह्मांड इसी में है,
मेरे शून्य को तेरे शून्य से जोड़ने का सार इसी में है।

शून्य सुन्दर है, मनोरम है।
शून्य दिव्य है, अनुपम है।
पर कोण बदलो तो इसमें ज्वाला है,
डराती, भरमाती नरमुंडों की माला है।

शून्य में ताकूँ
तो दुनिया अलग दिखाई देती है।

ललित जो शून्य,
चमकता कभी मुफलिसी के आलम में।
और कभी टकराता,
कुछ साहिलों से मानवता के समागम में।

अजीब है शून्य,
प्राणेश्वरी की टीस बढ़ाता है।
कभी अंकों में लग जाये,
तो कॉलेज की फीस बढ़ाता है।

अग्रसर हूं अब शून्य के पथ पर।
आज झांकता हूं,
उस चौखट के पार गंगा में
तो शक्ल की गंध आती है।
शून्य मुझे माफ करे ,
आखिर वही अन्तर्यामी है।

शून्य में ताकूँ
तो दुनिया अलग दिखाई देती है।